पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच ईरान और अमेरिका ने बुधवार को दो हफ्ते के युद्धविराम पर सहमति जताई है। इस समझौते के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की “सभ्यता को नष्ट करने” जैसी अपनी पूर्व धमकियों से पीछे हटने के संकेत दिए हैं। हालांकि युद्धविराम के बावजूद कई बड़े सवाल अभी भी अनसुलझे हैं, जिनमें सबसे अहम होरमुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण और ईरान का परमाणु संवर्धन कार्यक्रम शामिल है।

समझौते के बाद भी ईरान ने साफ किया है कि वह जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने की अपनी नीति जारी रखेगा और यूरेनियम संवर्धन भी नहीं रोकेगा। यह जलमार्ग दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिकी युद्धपोत इस क्षेत्र में तैनात रहेंगे, जिससे आने वाले दिनों में तनाव फिर बढ़ सकता है।

इज़राइल ने अमेरिका-ईरान युद्धविराम का समर्थन किया है, लेकिन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कर दिया कि लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी। यह बयान पाकिस्तान के उस दावे से अलग है, जिसमें कहा गया था कि युद्धविराम में लेबनान मोर्चा भी शामिल है। पाकिस्तान ने यह भी बताया कि स्थायी शांति योजना पर बातचीत शुक्रवार से इस्लामाबाद में शुरू हो सकती है।

तेहरान में युद्धविराम की घोषणा के बाद कट्टरपंथी समर्थकों ने अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ प्रदर्शन किए और झंडे जलाए। इससे साफ है कि ईरान के भीतर भी इस समझौते को लेकर विरोध मौजूद है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही ईरानी सैन्य निगरानी में जारी रहेगी।

युद्धविराम के बावजूद ईरान की कई मांगें—जैसे अमेरिकी सैनिकों की वापसी, प्रतिबंध हटाना और जमे हुए फंड की रिहाई—अब भी बनी हुई हैं। दूसरी ओर अमेरिका और इज़राइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों और क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों पर सख्त रुख बनाए हुए हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि दो हफ्ते बाद हालात स्थायी शांति की ओर बढ़ेंगे या फिर क्षेत्र एक बार फिर बड़े युद्ध की ओर लौट सकता है।