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इजरायल में सरकार गठन का समीकरण समझने के लिए तीन आंकड़े सबसे अहम हैं: नेतन्याहू के गठबंधन की 53 सीटें, विपक्ष की 48 सीटें और अरब दलों की संभावित 19 सीटें। 120 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए 61 सीटें चाहिए।

अरब दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन यह मानना सही नहीं होगा कि उनकी सभी 19 सीटें एक साथ किसी एक गठबंधन को मिल जाएंगी। सरकार गठन का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-से दल किस पक्ष का समर्थन करते हैं और क्या वे गठबंधन में शामिल होने या बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार हैं।

इजरायल में सरकार गठन के तीन संभावित रास्ते

1. विपक्ष और अरब दलों का गठबंधन: 67 सीटें

विपक्षी गठबंधन की 48 सीटों में अरब दलों की सभी 19 सीटें जोड़ दी जाएं, तो कुल संख्या 67 सीटें हो जाती है। यानी बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों से छह अधिक।

लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा राजनीतिक है। विपक्ष के कई प्रमुख नेताओं ने अरब दलों के साथ गठबंधन या सहयोग पर आपत्ति जताई है। इसलिए गणित के लिहाज से यह रास्ता संभव है, लेकिन राजनीतिक सहमति आसान नहीं होगी। 

2. नेतन्याहू का विपक्षी नेताओं के साथ समझौता

नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान है। बहुमत के लिए उसे कम से कम आठ अतिरिक्त सांसदों का समर्थन चाहिए।

इसके लिए नेतन्याहू विपक्ष के कुछ दलों या नेताओं को साथ लाने की कोशिश कर सकते हैं। एक व्यापक राष्ट्रीय एकता सरकार का विकल्प भी सामने आ सकता है, जिसमें कुछ विपक्षी नेता शामिल हों और दक्षिणपंथी गठबंधन के कुछ विवादास्पद चेहरे सरकार से बाहर रहें। 

3. सरकार न बनने पर दोबारा चुनाव

यदि नेतन्याहू बहुमत नहीं जुटा पाते और विपक्ष अरब दलों के समर्थन के बावजूद सरकार बनाने पर सहमत नहीं होता, तो राजनीतिक गतिरोध पैदा हो सकता है। ऐसी स्थिति में दोबारा चुनाव की संभावना बढ़ जाएगी। हालांकि, इससे पहले अल्पमत सरकार या दूसरे राजनीतिक समझौतों की कोशिश हो सकती है। 

अरब पार्टियां क्या भूमिका निभा सकती हैं?

अरब दलों के सामने तीन विकल्प हैं:

  • विपक्ष को समर्थन देना: इससे विपक्षी गठबंधन 67 सीटों तक पहुंच सकता है, बशर्ते सभी 19 सांसदों का समर्थन मिले।
  • बाहर से समर्थन देना: अरब दल सरकार में शामिल हुए बिना विश्वास मत या कुछ महत्वपूर्ण संसदीय फैसलों में विपक्ष का साथ दे सकते हैं।
  • किसी भी गठबंधन से दूरी रखना: इससे दोनों प्रमुख खेमों के लिए बहुमत जुटाना और कठिन हो सकता है।

इनमें से कौन-सा विकल्प चुना जाएगा, यह अरब दलों की शर्तों और दूसरे राजनीतिक दलों की सहमति पर निर्भर करेगा।

निष्कर्ष

फिलहाल नेतन्याहू के पास सबसे बड़ा राजनीतिक खेमा होने का लाभ है, जबकि विपक्ष के पास अरब दलों के संभावित समर्थन से बहुमत तक पहुंचने का गणित है। लेकिन विपक्ष के भीतर अरब दलों के साथ सहयोग को लेकर मतभेद हैं। इसलिए अगली सरकार का फैसला केवल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि गठबंधन बनाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति तय करेगी।

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