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इजरायल के चुनाव में अरब राजनीतिक दलों को मिली संभावित 19 सीटों ने उन्हें सरकार गठन के समीकरण में अहम स्थान पर ला दिया है। 120 सदस्यीय संसद नेसेट में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं, जबकि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को 53 और गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिलने का अनुमान है। ऐसे में अरब दलों का समर्थन विपक्ष को सरकार बनाने का रास्ता दे सकता है। 

लेकिन अरब दलों का समर्थन अपने आप में तय नहीं है। उनके नेताओं ने सरकार में शामिल होने और बाहर से समर्थन देने के अलग-अलग विकल्पों के संकेत दिए हैं। उनकी प्राथमिकताओं में अरब नागरिकों की सुरक्षा, सामाजिक-आर्थिक समानता और फिलिस्तीन से जुड़े सवाल प्रमुख हैं।

1. अरब समुदाय में अपराध और हिंसा पर नियंत्रण

अरब दलों की सबसे प्रमुख मांगों में अरब बहुल कस्बों और शहरों में बढ़ते अपराध तथा हिंसा पर लगाम लगाना शामिल हो सकता है।

जॉइंट लिस्ट के नेता अहमद तिबी ने सरकार गठन के संदर्भ में अरब समुदाय में अपराध और हिंसा से निपटने के लिए गंभीर सरकारी कार्रवाई की मांग की है। इसका अर्थ पुलिस व्यवस्था को प्रभावी बनाना, संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा बढ़ाने जैसे कदम हो सकते हैं। 

राजनीतिक महत्व: अरब दल इसे केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि अपने मतदाताओं की रोजमर्रा की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मान सकते हैं।

2. घरों को गिराने की कार्रवाई पर रोक

अरब दलों की दूसरी प्रमुख मांग बेदुइन समुदायों के कस्बों और गांवों में घरों को गिराने की कार्रवाई रोकने से संबंधित हो सकती है।

जॉइंट लिस्ट ने विशेष रूप से बेदुइन इलाकों में मकानों को गिराए जाने पर रोक लगाने का मुद्दा उठाया है। ऐसे मामलों में भूमि, निर्माण की अनुमति और आवासीय अधिकारों से जुड़े विवाद भी शामिल होते हैं। 

समर्थन के बदले अरब दल संबंधित क्षेत्रों में आवासीय समस्याओं के समाधान, कानूनी स्थिति स्पष्ट करने और विस्थापन रोकने के लिए सरकारी प्रतिबद्धता मांग सकते हैं।

3. बजट और सामाजिक-आर्थिक समानता

अरब दल अपने समुदायों के लिए अधिक सरकारी निवेश और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार की मांग भी उठा सकते हैं।

इन मांगों में संभावित रूप से शामिल हैं:

  • अरब बहुल इलाकों में स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अधिक बजट।
  • स्थानीय बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक परिवहन में सुधार।
  • रोजगार के अवसर बढ़ाना और आर्थिक असमानता कम करना।
  • स्थानीय निकायों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना।

ये संभावित वार्तागत प्राथमिकताएं हैं; उपलब्ध रिपोर्टों में इन सभी को किसी एक संयुक्त, औपचारिक शर्त के रूप में घोषित नहीं किया गया है।

4. फिलिस्तीन और गाजा का मुद्दा

अरब दलों के लिए फिलिस्तीन का सवाल भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। गाजा युद्ध और लेबनान से जुड़े संघर्षों के संदर्भ में इजरायल की सैन्य नीतियों पर उनका रुख सरकार गठन की बातचीत को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, सभी अरब दलों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। रॉयटर्स के अनुसार, जॉइंट लिस्ट के नेता यूसुफ जबारीन ने संकेत दिया है कि उनका दल आइजेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार को बाहर से समर्थन देने पर विचार कर सकता है, लेकिन गाजा और लेबनान पर उसके रुख के कारण सरकार में शामिल होने को लेकर उसकी सीमाएं हैं। इसके विपरीत, राम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने सरकार में शामिल होने की इच्छा जताई है। 

इसलिए फिलिस्तीन के मुद्दे पर अरब दलों की भूमिका समर्थन की शर्तों, संसदीय सहयोग और सरकार में भागीदारी के स्वरूप के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

5. सरकार में भागीदारी या बाहर से समर्थन?

अरब दलों के सामने सबसे बड़ा रणनीतिक सवाल यह है कि वे सरकार में शामिल होकर फैसले लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनें या बाहर से समर्थन देकर अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखें।

बाहर से समर्थन का विकल्प विपक्ष के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है। यदि विपक्ष के 48 सांसदों को अरब दलों के सभी 19 सांसदों का समर्थन मिल जाए, तो संयुक्त संख्या 67 हो सकती है। यह बहुमत के 61 के आंकड़े से छह अधिक है। हालांकि, यह गणित तभी लागू होगा जब सभी संबंधित दल सहयोग पर सहमत हों और अन्य राजनीतिक बाधाएं दूर हों। 

इस व्यवस्था में अरब दल सरकार का औपचारिक हिस्सा बने बिना विश्वास मत, बजट और दूसरे महत्वपूर्ण संसदीय फैसलों पर समर्थन दे सकते हैं। बदले में वे अपने समुदायों से संबंधित मुद्दों पर लिखित समझौते और समयबद्ध सरकारी कार्रवाई की मांग कर सकते हैं।

दूसरी ओर, आइजेनकोट और विपक्ष के कुछ अन्य नेताओं ने अरब दलों के साथ गठबंधन को लेकर संकोच दिखाया है। यही राजनीतिक बाधा अरब दलों के संभावित समर्थन को वास्तविक सत्ता परिवर्तन में बदलने की राह कठिन बना सकती है। 

निष्कर्ष: सीटों की ताकत को नीतिगत फैसलों में बदलने की चुनौती

अरब दलों के लिए यह चुनाव संसद में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक मांगों को आगे बढ़ाने का अवसर भी है। अपराध नियंत्रण, आवासीय अधिकार, स्थानीय विकास और फिलिस्तीन के सवाल पर सरकारी प्रतिबद्धताएं उनकी बातचीत का हिस्सा बन सकती हैं।

लेकिन 19 सीटें होने का अर्थ यह नहीं कि अरब दल अपने सभी मुद्दे मनवा सकेंगे। उनकी वास्तविक ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितने एकजुट रहते हैं, विपक्ष उनके साथ किस हद तक सहयोग करने को तैयार होता है और क्या दोनों पक्ष ठोस शर्तों पर सहमत हो पाते हैं।

आखिरकार, इजरायल में सरकार गठन का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन प्रधानमंत्री बनेगा। यह भी है कि क्या अरब दलों के बढ़े हुए संसदीय प्रतिनिधित्व को ठोस नीतिगत बदलावों में बदला जा सकेगा।

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