बिहार में भी भाजपा इस्तेमाल करना चाहती थी ‘एकनाथ शिंदे’ वाला दाँव, नीतीश कुमार ने सारी बिसात पलट दी..

कुछ महीने पहले जब महाराष्ट्र में राजनीतिक दाँव-पेंच खेले जा रहे थे तो भाजपा के नेता ख़ुश और विपक्षी नेता मायूस नज़र आ रहे थे. वहीं बिहार में बाज़ी पूरी तरह पलटी हुई नज़र आ रही है. विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा ने महाराष्ट्र की ही तरह बिहार में भी एमएलसी चुनाव के बाद से ही अन्दर-अन्दर राजनीतिक शतरंज खेलनी शुरू कर दी थी. जदयू के पूर्व नेता आरसीपी सिंह के ज़रिए भाजपा बहुत कुछ करने की फ़िराक़ में थी.

जदयू नेता कह रहे हैं कि भाजपा आरसीपी सिंह के ज़रिए जदयू में फूट डालना चाहती थी और उसके बाद अपना मुख्यमंत्री राज्य में बनाना चाहती थी. इस बात को लेकर महाराष्ट्र का उदाहरण दिया जा रहा है. महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना ख़ेमे में बग़ावत कराई और शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन वाली सरकार गिर गई. भाजपा ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री भी बनाया और शिवसेना को इतना कमज़ोर कर दिया कि अब शिवसेना को अपना चुनाव चिन्ह बचाने के लिए चुनाव आयोग और अदालत के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं.

जून में हुई इस उठापटक को अभी कुछ ही दिन हुए थे कि ख़बरों में नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह को लेकर बयान आने लगे. ऐसी भी ख़बरें आयीं कि भाजपा जदयू को ख़त्म करने की सारी प्लानिंग कर चुकी है. जहाँ भाजपा अपनी प्लानिंग कर रही थी वहीं नीतीश कुमार ये सब देख-समझ रहे थे. जदयू नेताओं की मानें तो नीतीश कुमार ने सबसे पहले अपनी पार्टी के सभी विधायकों-सांसदों और अन्य नेताओं को एकजुट किया.

जदयू ने इसके बाद कांग्रेस और राजद नेताओं से बात की. राजद से नीतीश कुमार के सम्बन्ध पिछले साल की तुलना इस साल बेहतर थे. नीतीश कुमार अक्सर तेजस्वी यादव से बात करने लगे थे और परिवार में भी पुरानी कटुता अब नहीं रही थी. ऐसे में नीतीश कुमार ने राजद और कांग्रेस से जब बात की तो एक सहमति बन गई.

इस पूरी चर्चा की ख़बर जब भाजपा के केन्द्रीय नेताओं को लगी तो भाजपा ने नीतीश को मनाने की कोशिश की. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने नीतीश कुमार से बात की लेकिन नीतीश नहीं माने. वहीं जदयू नेता ये भी दावा कर रहे हैं कि भाजपा ने जदयू विधायकों को पाला बदलने के लिए 6 करोड़ रुपए तक का ऑफ़र दिया.

नीतीश कुमार ने NDA से अलग हो गए और फिर से महागठबंधन के साथ आ गए. इस पूरे घटनाक्रम से भाजपा को कई झटके लगे हैं. पहला तो यही कि बिहार जैसे महत्वपुर्ण राज्य में सरकार चली गई, दूसरा ये कि पार्टी राज्यसभा में पहले की तुलना में कमज़ोर हो गई है और तीसरा जोकि सबसे बड़ा झटका है वो ये कि जिस तरह से पार्टी की एक छवि बनी थी कि जहाँ चाहे जब चाहे भाजपा अपनी सरकार बना लेगी, वो थ्योरी बिहार में बुरी तरह फ़ेल हो गई.

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Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

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