लखनऊ। भाकपा (माले) उत्तर प्रदेश राज्य इकाई के आह्वान पर आज यूपी प्रेस क्लब, लखनऊ में दमन-विरोधी कन्वेंशन आयोजित किया गया। कन्वेंशन में प्रदेश के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी रही। किसान संगठनों, जनसंगठनों, महिला संगठनों, सांस्कृतिक मोर्चों, वामपंथी दलों और लोकतांत्रिक संगठनों से जुड़े प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए। वक्ताओं और प्रतिभागियों ने इसे उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र आधारित दमन, भूमि-वन अधिकारों पर हमले और असहमति के अपराधीकरण के खिलाफ एक संगठित और दीर्घकालिक संघर्ष की शुरुआत बताया।

कन्वेंशन की तत्काल पृष्ठभूमि मिर्ज़ापुर में चल रहे आदिवासी वन भूमि संघर्ष और उससे जुड़े घटनाक्रम रहे, जिसके बाद भाकपा (माले) के नेताओं जीरा भारती और सुधाकर यादव की गिरफ्तारी की गई।

कन्वेंशन के समक्ष रखे गए तथ्यों के अनुसार, मिर्ज़ापुर ज़िले में आदिवासी समुदाय लंबे समय से अपने वन भूमि और आजीविका अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस संघर्ष का नेतृत्व स्थानीय आदिवासी समुदाय कर रहे हैं, जिसमें भाकपा (माले) की मिर्ज़ापुर ज़िला इकाई के सचिव जीरा भारती की सक्रिय भूमिका रही है।
2 जनवरी 2026 को बुलडोज़र कार्रवाई के विरोध में मिर्ज़ापुर मंडलायुक्त कार्यालय पर एक बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया गया, जिसमें बहुत बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। इस दौरान प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की और उनकी मांगों पर विचार का आश्वासन दिया।

लेकिन इसी दिन रात में, पुलिस बड़ी संख्या में बुलडोज़रों के साथ पहुँची और खड़ी फसलों को रौंदने की कार्रवाई शुरू की। दिन में दिए गए आश्वासनों के तुरंत बाद की गई इस कार्रवाई से टकराव की स्थिति बनी, जिसमें दोनों पक्षों के लोगों के घायल होने की सूचना सामने आई। इसके बाद जीरा भारती और भाकपा (माले) उत्तर प्रदेश राज्य सचिव सुधाकर यादव को गिरफ्तार कर लिया गया। कन्वेंशन में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि रात की इस घटना के समय दोनों नेता मौके पर मौजूद नहीं थे, और उनकी गिरफ्तारी का उद्देश्य संघर्ष को तोड़ना और नेतृत्व को निशाना बनाकर आंदोलन को डराना था।

इन्हीं घटनाओं की पृष्ठभूमि में यह कन्वेंशन आयोजित किया गया।

कन्वेंशन की अध्यक्षता ऑल इंडिया किसान महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश नारायण ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि आज बुलडोज़र एक प्रशासनिक उपकरण नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भूमि, वन और आजीविका से जुड़े सवालों को कानून और संवाद के माध्यम से सुलझाने के बजाय राज्य बल प्रयोग और दमन का रास्ता अपना रहा है। उन्होंने कहा कि जहाँ-जहाँ गरीब, किसान और आदिवासी संगठित होकर अपने अधिकारों की बात करते हैं, वहीं असहमति को अपराध घोषित कर दिया जाता है।

लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रविकांत ने दमन की इस प्रक्रिया को लोकतंत्र के व्यापक संकट से जोड़ा। उन्होंने कहा कि विरोध और प्रतिरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश करना, और राजनीतिक सवालों को पुलिसिया कार्रवाई में बदल देना, संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह प्रवृत्ति केवल गाँवों और जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर लोकतांत्रिक क्षेत्र को प्रभावित कर रही है।

रामजी राय, पोलित ब्यूरो सदस्य, भाकपा (माले) लिबरेशन, ने कहा कि
“बुलडोज़र राज और दमन की यह राजनीति किसी एक घटना या ज़िले तक सीमित नहीं है। यह उस शासन-पद्धति का हिस्सा है जिसमें भूमि, वन और आजीविका के सवालों को लोकतांत्रिक संवाद से नहीं, बल्कि भय और हिंसा के ज़रिए हल किया जा रहा है। मिर्ज़ापुर का घटनाक्रम साफ़ दिखाता है कि जब लोग संगठित होकर अपने अधिकारों की माँग करते हैं, तो असहमति को अपराध में बदल दिया जाता है। इस दमन के खिलाफ संघर्ष केवल ज़रूरी नहीं, बल्कि अपरिहार्य है।”

अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन की राज्य सचिव कृष्णा अधिकारी ने भूमि संघर्ष और बुलडोज़र कार्रवाई के लैंगिक प्रभाव पर बात रखी। उन्होंने कहा कि जब ज़मीन, फसल या घर पर हमला होता है, तो महिलाओं पर उसका सबसे गहरा असर पड़ता है—भोजन सुरक्षा, देखभाल की ज़िम्मेदारी, असुरक्षा और हिंसा के रूप में। उन्होंने कहा कि दमन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी होता है, और इसमें महिलाओं की भागीदारी को डराने के लिए विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है।

भाकपा लखनऊ के ज़िला सचिव परमानंद ने कहा कि आज झूठे मुक़दमे और गिरफ़्तारियाँ दमन का प्रमुख हथियार बन चुकी हैं। उन्होंने कहा कि जब किसी घटना के समय मौके पर मौजूद न होने के बावजूद नेताओं को जेल भेजा जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उद्देश्य न्याय नहीं, बल्कि संगठित प्रतिरोध को कुचलना है।

ऑल इंडिया फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की राज्य सचिव डॉ. आरती ने दमन और विस्थापन को राजनीतिक-आर्थिक नीति से जोड़ा। उन्होंने कहा कि विस्थापन कोई आकस्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सोची-समझी नीति है, जिसमें पहले लोगों को “अतिक्रमणकारी” बताया जाता है और फिर बल प्रयोग के ज़रिए ज़मीन खाली कराई जाती है।

भाकपा (माले) लखनऊ के ज़िला प्रभारी रमेश सिंह सेंगर, जिन्होंने कन्वेंशन का संचालन भी किया, ने कहा कि इन गिरफ़्तारियों और मुक़दमों का उद्देश्य आंदोलन को तोड़ना है, लेकिन इस कन्वेंशन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संघर्ष और व्यापक होगा। उन्होंने कहा कि भूमि, वन और सम्मान के अधिकार डर के माहौल में तय नहीं किए जा सकते।

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर ने कहा कि दमन केवल लाठी और बुलडोज़र से नहीं, बल्कि एक झूठे नैरेटिव के ज़रिए भी किया जाता है, जिसमें जन आंदोलनों को अपराध और विकास-विरोध के रूप में पेश किया जाता है। उन्होंने सांस्कृतिक और वैचारिक प्रतिरोध की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

कन्वेंशन के अंत में सर्वसम्मति से निम्न प्रस्ताव पारित किए गए:

1. वनाधिकार क़ानून को पूरी तरह लागू किया जाए और ग्राम सभा के अधिकारों को मान्यता दी जाए।

2. बिना उचित प्रक्रिया के की जा रही बुलडोज़र कार्रवाइयों पर तत्काल रोक लगे।

3. भाकपा (माले) के नेताओं जीरा भारती और सुधाकर यादव को तत्काल रिहा किया जाए और सभी फ़र्ज़ी मुक़दमे वापस लिए जाएँ।

4. उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में ग्राम सभा की भूमि पर रह रहे गरीबों को उजाड़ने की कार्रवाई रोकी जाए।

5. 2 जनवरी की रात हुई पुलिस हिंसा के लिए ज़िम्मेदार पुलिसकर्मियों पर मुक़दमा दर्ज किया जाए।

कन्वेंशन ने इन मांगों को लेकर राज्य-व्यापी, लोकतांत्रिक और सतत संघर्ष चलाने का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि यह संघर्ष किसी एक ज़िले या घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि उस शासन-पद्धति के खिलाफ है जिसमें भूमि, आजीविका और अधिकारों को भय और दमन के ज़रिए कुचला जा रहा है।

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