जापान में हालिया आम चुनावों के बाद संसद में महिला प्रतिनिधित्व पहले के मुकाबले बढ़ा है और देश को पहली महिला प्रधानमंत्री भी मिली है, लेकिन संसद भवन के भीतर बुनियादी सुविधाओं की कमी अब एक बड़ा सवाल बन गई है। संसद सत्र शुरू होने से पहले महिला सांसदों को शौचालय के बाहर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है, जिससे जापान की राजनीति में मौजूद लैंगिक असमानता एक बार फिर उजागर हुई है।
अक्टूबर में हुए चुनावों के बाद 465 सदस्यीय निचले सदन में 73 महिलाएं चुनकर आईं, जबकि ऊपरी सदन में 248 में से 74 सीटों पर महिला सांसद हैं। इसके बावजूद निचले सदन के मुख्य कक्ष के पास महिला सांसदों के लिए केवल दो केबिन वाला एक ही शौचालय उपलब्ध है। इसकी वजह संसद भवन की पुरानी संरचना मानी जा रही है, जिसका निर्माण 1936 में हुआ था। उस समय जापान में महिलाओं को न तो वोट देने का अधिकार था और न ही राजनीति में उनकी भागीदारी की कल्पना की गई थी। महिलाओं को मताधिकार 1945 में मिला।
हालांकि चुनावी आंकड़े बदल रहे हैं, लेकिन राजनीति का माहौल अब भी काफी हद तक पुरुष प्रधान बना हुआ है। चुनाव अभियानों के दौरान कई महिला उम्मीदवारों को लैंगिक टिप्पणियों और तंज का सामना करना पड़ता है। कभी उन्हें राजनीति छोड़कर घर और बच्चों की देखभाल की सलाह दी जाती है, तो कभी व्यक्तिगत जीवन को लेकर कटाक्ष किए जाते हैं।
संसद में सुविधाओं की कमी को लेकर अब महिला सांसदों ने आवाज़ उठाई है। शौचालयों की संख्या बढ़ाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर प्रधानमंत्री सहित करीब 60 महिला सांसदों के हस्ताक्षर हैं। याचिका में कहा गया है कि संसद में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के अनुरूप बुनियादी ढांचे का विस्तार किया जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने इसे एक तरफ प्रगति का संकेत बताया है, लेकिन दूसरी ओर उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह स्थिति जापान में लैंगिक समानता की कमी को दर्शाती है। वैश्विक स्तर पर भी जापान की स्थिति कमजोर बनी हुई है। वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की ताज़ा जेंडर गैप रिपोर्ट में जापान 148 देशों में 118वें स्थान पर है।
तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो जर्मनी और अमेरिका में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ने के साथ संसदों में सुविधाओं का विस्तार किया गया। वहीं भारत में नए संसद भवन में महिलाओं के लिए बेहतर व्यवस्थाएं की गई हैं, हालांकि वहां भी समानता की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। जापान का यह मामला साफ करता है कि प्रतिनिधित्व बढ़ने के साथ-साथ संस्थागत ढांचे में बदलाव भी उतना ही जरूरी है।