सपा ने बनाई भाजपा को घेरने की रणनीति, विधानसभा चुनाव में सबसे मज़बूत होगा ये..

लखनऊ: 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में सभी राजनैतिक दल अपनी किस्मत आज़माने के लिए तैयारियां शुरू कर चुके हैं। रोज़ाना नए समीकरण बन रहे हैं तो कुछ पुराने समीकरण नेस्तनाबूत भी हो रहे हैं। हर राजनैतिक दल चाहे छोटा हो या बड़ा इस चुनावी कुंभ में कूदने के लिए रणनीति तैयार कर रहा है। बड़े दल नफ़ा नु’कसान देखकर गठबंधन करने के लिए सहयोगी तलाश रहे हैं तो छोटे दल भी चुनावी मौसम में मोल -भाव करने में कोई कसर नही छोड़ रहे हैं।

सूबे में आगामी कुछ दिनों में होने वाले विधानसभा चुनाव का असर केवल उत्तर प्रदेश की ही नही बल्कि पूरे देश की राजनैतिक दिशा व दशा तय करेंगे। मौजूदा परिस्थितियों की अगर बात की जाए तो 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 312, सपा 47 , बसपा 19 व कांग्रेस को 7 सीटें मिली थी। 312 सीटें जीतकर भाजपा ने सपा से सत्ता छीनकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। बीजेपी की इस जीत में छोटी जातियों का बड़ा योगदान था। बीजेपी ने उत्तर प्रदेश को फतह करने के लिए एक खास रणनीति 2017 के चुनावों में बनाई थी जिसकी काट किसी भी अन्य दल के पास नही थी। 2017 के चुनावों में बीजेपी ने अतिदलित, अति पिछड़े,पिछड़े,ब्राह्मण,ठाकुर जातियों को जोड़कर एक ऐसा गठजोड़ तैयार किया था जिसने बीजेपी को सत्ता के शिखर पर लाकर खड़ा कर दिया।

इतना ही नही बीजेपी ने कुर्मी , राजभर वोट को भी अपने साथ जोड़ने के लिए अपना दल(एस), सुभसपा से गठबंधन कर सपा की साईकल को पंचर करने का काम किया था। बीजेपी व आरएसएस 2017 के चुनावों में जनता के बीच यह प्रचार ले जाने में कामयाब रही थी कि समाजवादी पार्टी की सरकार में सिर्फ एक जाति विशेष के लोगों को ही जगह व सम्मान मिलता है,बाकी जातियों को सपा सरकार में हाशिये पर ढकेल दिया गया है। इस प्रचार ने सपा के खिलाफ एक ऐसा माहौल तैयार किया था जिसका फायदा बीजेपी को मिला था।

सपा 2017 में उस समय के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में चुनावी समर में दुबारा सत्ता प्राप्त करने के लिए कूदी थी। 2012 के विधानसभा चुनावों में यादव,मुस्लिम,कुर्मी,गडरिया,पासी ,ब्राह्मण,ठाकुर को अपने साथ जोड़कर सपा ने उत्तरप्रदेश में परचम फहराया था। इस पूर्ण बहुमत की जीत में सपा के चुनावी घोषणा पत्र में किये गए वादे का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। लेकिन 2017 आते आते अखिलेश का जादू राज्य की जनता में कम होता गया। इसी बीच बीजेपी ने सपा के साथ हमेशा से खड़ी रहने वाली जातियों जैसे गड़रिया, पासी, कुम्हार,कुर्मी आदि को तोड़कर अपने साथ मिला लिया।

संघ लोक सेवा आयोग में किसी एक जाति विशेष की नियुक्ति को लेकर बीजेपी व सहयोगी संगठनों ने समाजवादी पार्टी के खिलाफ एक ऐसा माहौल तैयार किया जिसका खा’मियाजा यह हुआ कि सवर्ण जातियां समाजवादी पार्टी से दूर हट गई। इन सब के कारण सपा को सत्ता की कुर्सी से 2017 के चुनावों में हाथ धोना पड़ गया। बसपा को 2017 के चुनावों में 19 सीटें हासिल हुई थीं। 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा का 2017 के चुनवों में बु’रा ह’श्र हुआ। बसपा के साथ लामबंद रहने वाली जातियां जैसे अति दलित , मौर्या,कुर्मी(कुछ हिस्सा),कुम्हार,कुशवाहा,आदि को बीजेपी ने तोड़कर अपने साथ मिला लिया।

इतना ही नही बीजेपी ने बसपा के अलग अलग जातियों के नेताओं को भी अपने साथ मिला लिया जिसका असर यह हुआ कि बसपा के पास मात्र जाटव वोट को छोड़कर अन्य सभी जातियों के वोट बीजेपी के साथ जुड़ गए। कांग्रेस 2017 के चुनावों में सपा के साथ गठबंधन करके मैदान में उतरी थी। इन चुनावों में कांग्रेस को मात्र 7 सीटों पर ही जीत का स्वाद चखने को मिला था। अगर बात की जाए कि आने वाले साल 2022 के चुनावों में सभी राजनैतिक दलों की स्थिति क्या होगी तो यह निश्चित रूप से दिखाई दे रहा है कि 2022 का चुनाव बीजेपी के लिए आसान नही होने जा रहा है।

सत्ता वि’रोधी लहर के साथ साथ रोज़गार,शिक्षा,स्वास्थ्य आदि की व्यवस्था करने में वर्तमान योगी सरकार ना’काम रही है। प्राथमिक शिक्षा की स्थिति राज्य में बद से ब’दतर हो गयी है। पढ़ा लिखा नौजवान काम न मिलने की वजह से घरों में बैठा हुआ है। कोरोना महामारी के समय स्वास्थ्य संबंधी मूलभूत सुविधाओं के लिए भी राज्य की जनता को दर दर भटकना पड़ा। कई मरीजों को इलाज, बेड,ऑक्सीजन सिलेंडर, दवाई आदि के अभाव में दम तोड़ना पड़ा। जिसका असर यह हुआ कि योगी सरकार के प्रति जनता का विश्वास डोल गया है।

सबको शिक्षा,स्वास्थ्य,रोज़गार दिलवाने के वादा करके सत्ता में आई योगी सरकार अपना एक भी वादा पूरा करने में अभी तक ना’काम ही दिखाई दी है। प्रदेश में बढ़ती महिला हिं’सा,जातीय व सा’म्प्रदायिक हिं’सा ने भी योगी सरकार को क’टघरे में खड़ा कर दिया है। बढ़ती महंगाई,किसान आन्दोल ने भी एक बड़े वर्ग को बीजेपी के खि’लाफ खड़ा कर दिया है। जिसका असर आने वाले विधानसभा चुनावों में देखने को मिल सकता है। 2017 के चुनावों में बीजेपी को सत्ता दिलवाने में अहम भूमिका ब्राह्मण समुदाय की रही थी। लेकिन वर्तमान में ब्राह्मण समुदाय का एक वर्ग बीजेपी से ना’राज़ हो गया है। सरकार से लेकर प्रशासन तक मे ब्राह्मणों की भागीदारी वर्तमान सरकार में न के बराबर है।

साथ ही प्रदेश भर में ब्राह्मणों के साथ हुए उ’त्पीड़न ने भी ब्राह्मणों को बीजेपी से दूर किया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में यदि ब्राह्मण बीजेपी से जरा भी छि’टकता है तो उसका नुकसान बीजेपी को उठाना पड़ सकता है। ब्राह्मण एक ऐसी कौम है वो जिधर भी जाएगी अपने साथ अन्य जातियों को भी लेकर जाएगी। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि आगामी विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ समेत पूरी बीजेपी के लिए आसान नही होने वाले हैं। वहीं दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल सपा भी 2022 के चुनावों को जीतने के लिए पूरा दम लगा रही है।

अखिलेश यादव समेत पूरी समाजवादी पार्टी ये अच्छी तरह जानती है कि इस बार के विधानसभा चुनावों में सिर्फ MY कार्ड से ही जीत हासिल नही की जा सकती है। सूबे में एक बार फिर सत्ता प्राप्त करने के लिए अन्य जातियों को भी समाजवादी पार्टी के साथ जोड़ना होगा। पिछले चुनावों के अनुभव के आधार पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी यह कह रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनावों में सपा किसी बड़े दल से गठबंधन न करके छोटे दलों को साथ लाने की कोशिश करेगी। सपा यह समझती है कि छोटी जातियों को साथ लाकर बड़ा उ’लटफेर किया जा सकता है।

इसी रणनीति को कामयाब करने के लिए अखिलेश यादव स्वयं ओपी राजभर, आम आदमी पार्टी, प्रसपा, अपना दल( कृष्णा पटेल गुट )व बाबू लाल कुशवाहा से बातचीत कर रहे हैं। अखिलेश यह जानते हैं कि ये छोटे दल ही सपा को चुनावी वैतरणी पार करवा सकते हैं। अखिलेश यादव की बेदाग छवि के साथ सपा सरकार की योजनाओं ने भी जनता के सामने सपा को एक मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा कर दिया है। ऐसे में यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि आने वाले चुनावों में ल’ड़ाई सपा और बीजेपी के बीच ही है।

बाकी दल 2022 के म’हाभारत से लगभग बाहर हो चुके हैं। 2007 में सरकार बनाने वाली बसपा 2017 में मात्र 19 सीटो पर सिमट कर रह गयी। इन 19 विधायकों में से लगभग सभी बसपा का दामन छोड़कर अन्य दलों में शामिल हो चुके है। मयावती का ढुलमुल रवैया, महंगाई,रोज़गार,स्वास्थ्य जैसे सवालों पर बसपा का सड़को पर न उतरना , बसपा की अंदुरूनी कलह ने भी बसपा को काफी नु’कसान पहुंचाया है। कभी दलितों ,अति पिछड़ों की मसीहा कही जाने वाली बहनजी से अति दलित,व अति पिछड़ी जातियां छि’टककर बीजेपी में जा चुकी हैं। जिसका असर यह हुआ कि बसपा का आधे से ज्यादा वोट बैंक बसपा से दूर चला गया। बसपा के साथ हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली जातियाँ जैसे मौर्या, कुर्मी, कुम्हार,पासी,मुसहर,कोइरी,कुशवाहा आदि जातियों का बसपा से मोह भंग हो चुका है और इन जातियों के सभी नेता बीजेपी के कमल को सींच रहे हैं।

पंचायत चुनावों में परोक्ष रूप से बसपा का बीजेपी का समर्थन करना भी भारी पड़ रहा है। मुस्लिम समुदाय का कुछ हिस्सा जो बसपा के साथ रहा करता था वो भी बसपा को छोड़ चुका है। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनावों में बसपा लड़ाई से पहले ही बाहर हो चुकी है। कांग्रेस ने 2017 का विधानसभा चुनाव सपा के साथ मिलकर ल’ड़ा था जिनमे कांग्रेस को 7 सीटों पर जीत मिली थी। पिछले 5 सालों में कांग्रेस ने सूबे में खुद को बदलने का काम किया है। प्रियंका गांधी की देख रेख में व प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू के नेतृत्व में उत्तरप्रदेश कांग्रेस के संगठन व कार्यशैली में बड़ा बदलाव देखने को मिल है।

जहाँ एक तरफ संगठन में युवाओं को जगह दी गयी है वहीं दूसरी तरफ दफ्तरों के अंदर कै’द रहने वाली कांग्रेस अब जनता के मुद्दों पर सड़को पर ल’ड़ाई ल’ड़ती दिखाई देती है। ये सारे संकेत कांग्रेस के लिये शुभ हैं। लेकिन अभी उत्तर प्रदेश की सत्ता को पुनः हासिल करने के किये कांग्रेस को एक लंबी दूरी तय करनी है। कांग्रेस इस समय प्रदेश में एक ऐसी स्थिति में है कि जिसमे उसके पास ज्यादा कुछ करने के लिए बचा नही है। कांग्रेस ने जो सीट पिछले चुनावों में जीती थी वो पुनः हासिल करना भी कांग्रेस के लिए चु’नौती है। ऐसी स्थितियों में यह कहा जा सकता है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश मे मुख्य ल’ड़ाई सत्ताधारी दल भाजपा व मुख्य वि’पक्षी दल सपा के बीच मे ही होने की पूरी संभावना है।

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Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

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