इतिहास की किताबों में हमने बहुत से यु-द्धों के बारे में पढ़ा है लेकिन एक ऐसा यु-द्ध रहा है जिसका ज़िक्र बहुत सी किताबों में नहीं है.कुछ लोगों को लगता है कि अंग्रेज़ों से भारतीय लोगों का पहला यु-द्ध 1757 में हुआ लेकिन उससे कहीं पहले अंग्रेज़ों की भिड़ंत मुग़लों से हो चुकी थी. 1686-1690 के दौरान हुए इस यु-द्ध के समय मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब था और औरंगज़ेब की शक्ति से कौन परिचित नहीं है. इस यु-द्ध को चाइल्ड यु-द्ध भी कहा जाता है क्यूंकि ये यु-द्ध ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर सर जोसिया चाइल्ड की वजह से शुरू हुआ था.

अधिक लालच और अधिकार के चक्कर में अंग्रेज़ों ने औरंगज़ेब को उकसा तो दिया लेकिन उसे ये ना पता था कि औरंगज़ेब और उसका जनरल शाइस्ता ख़ान के आगे उनकी एक ना चलनी. हालाँकि मुग़लों ने शुरू में बातचीत की कोशिश की और विवाद को सुलझाने का प्रयास किया. असल में यु-द्ध का बैकग्राउंड अगर देखें तो 1682 का है जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने विलियम हेजेज़ को भेजा शाइस्ता ख़ान के पास कि पूरे मुग़ल एम्पायर में क्कोम्पन्य ट्रेड कर सके और इसके लिए उसे विशेषाधिकार हो. औरंगज़ेब ने अंग्रेज़ों के इरादों को समझ लिया और बातचीत को रद्द कर दिया.

बातचीत रद्द होने के बाद चाइल्ड ने यु-द्ध की घोषणा कर दी जिसके बाद मुग़लों ने अंग्रेज़ों को बुरी तरह हराया. कंपनी के नुमाइंदे इसके बाद मुग़ल कोर्ट में हाज़िर हुए जहाँ उन्होंने माफ़ी मांगी और कहा कि आइन्दा वो बेहतर बर्ताव करेंगे. औरंगज़ेब ने दया दृष्टि दिखाई और कंपनी को कलकत्ता और बॉम्बे में फिर से स्थापित होने दिया. औरंगज़ेब की इस दया के पीछे इतिहासकार मानते हैं कि मुग़ल बादशाह को मालूम था कि कई ग़रीब भारतीय परिवार कंपनी से जुड़े हैं, ऐसे में उनके लिए संकट हो सकता है और जिस प्रकार का शासन मुग़ल के पास था उससे ये कहीं से भी अंदाज़ा नहीं लगता था कि कोई बाहरी ताक़त मुग़लों को बड़ी चुनौती दे पाएगी. औरंगज़ेब के बाद आने वाले मुग़ल बादशाहों का कमज़ोर होना और दरबार में फूट पड़ जाने की वजह से ही मुग़ल कमज़ोर हुए. देश में कई और शक्तियों का उदय भी अंग्रेज़ों को मज़बूत कर गया.

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