जीते हुए चुनाव को इस ग़लती से हारे अटल बिहारी बाजपेयी

सन 1962 का लोकसभा चुनाव बलरामपुर के राजनीतिक इतिहास में हमेशा चर्चा का विषय रहा है. राजनीति से जुड़े लोग बलरामपुर के इस लोकसभा चुनाव के क़िस्से बड़े शौक़ से सुनाते रहे हैं. असल में इस लोकसभा चुनाव का महत्व इसलिए अहम् है क्यूँकि यहाँ से अटल बिहारी बाजपाई ने चुनाव लड़ा था जो बाद में देश के प्रधानमन्त्री भी रहे.

अटल बिहारी बाजपाई ने सन 1962 में यहाँ से भारतीय जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ा. बाजपाई ने जब चुनावी अभियान की शुरुआत की तो उन्हें ऐसा आभास था कि उनकी स्थिति कांग्रेस की अपेक्षा बेहतर है. कांग्रेस ने यहाँ से सुभद्रा जोशी को प्रत्याशी बनाया था. कहा जाता है कि जवाहर लाल नेहरु पहले यहाँ से कमज़ोर उम्मीदवार उतारना चाहते थे ताकि अटल को चुनाव जीतने में मुश्किल न हो और जनसंघ के बड़े नेता अटल बिहारी को आसान जीत मिल जाए.

1957 के चुनाव में जनसंघ की महज़ 4 सीटें आयी थीं और नेहरु हमेशा विपक्ष की मज़बूती के पक्षधर थे. इसलिए वो चाहते थे कि वामपंथी पार्टी की तरह दूसरे विपक्षी दल भी मज़बूत हों. 1957 के लोकसभा चुनाव में बलरामपुर सीट भी कांग्रेस ने जीती थी, तब हैदर अली ने यहाँ से चुनाव जीता था.

अभी कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार की घोषणा नहीं हुई थी लेकिन अटल बिहारी अपने पक्ष में माहौल बनाना शुरू कर चुके थे. कहा जाता है कि इसी समय जब वो बलरामपुर की एक चाय की दुकान पर अपने कार्यकर्ताओं के साथ बैठे थे तो उन्होंने कुछ ऐसा कह दिया जिसके बाद सब कुछ पलट गया. उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि इस बार अगर भगवान् भी चाहे तो उन्हें हरा नहीं सकता. ये बात उसी कैफ़े में बैठे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने भी सुनी. ये बात कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को तो बुरी लगी, साथ ही अटल के साथ बैठे जनसंघ कार्यकर्ताओं ने भी इसको अच्छा नहीं माना.

कहा जाता है कि इसके बाद कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का एक समूह कांग्रेस नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के पास पहुँचा. उन्होंने गुज़ारिश की कि बलरामपुर से सुभद्रा जोशी को ही चुनाव लड़ाया जाए. इसके बाद नेहरु ने सुभद्रा जोशी को बलरामपुर से कांग्रेस का टिकट दिया.

सुभद्रा जोशी को जब टिकट मिला तो अटल कैम्प में चिंता दिखने लगी. सुभद्रा ने देश की आज़ादी के आन्दोलन में भाग लिया था. वो 1952 में करनाल से लोकसभा पहुँचीं तो 1957 में अम्बाला से उन्हें जीत मिली. सुभद्रा का राजनीतिक रिकॉर्ड इतना मज़बूत था कि अटल कैम्प को लगा कि अब चुनाव में जीतना बहुत मुश्किल है.

अटल ने चुनाव अभियान और तेज़ कर दिया. अटल को समर्थन मिलने लगा वहीं सुभद्रा भी कड़ी टक्कर दे रहीं थीं. इसी समय अटल ने एक अशोभनीय बयान दे दिया. असल में सुभद्रा अपने प्रचार में ये कहती रहती थीं कि यदि वो चुनाव जीतीं तो साल के बारह महीने और महीने के तीसों दिन उनकी सेवा को तत्पर रहेंगी.

इसी बयान के जवाब में अटल ने एक जनसभा में उपहास करते हुए कहा, ‘सुभद्रा जी कहती हैं कि वे महीने के तीसों दिन मतदाताओं की सेवा करेंगी. मैं पूछता हूँ, कैसे करेंगी? महीने में कुछ दिन तो महिलाएं सेवा करने लायक रहती ही नहीं हैं!’ कुछ विश्लेषक मानते हैं कि बाजपाई के इस बयान ने उनकी हार निश्चित सी कर दी. वहीं सुभद्रा ने इस टिपण्णी का जवाब ये कह कर दिया कि अटल द्वारा की गई इस बेइज़्ज़ती का बदला वो नहीं, उनके मतदाता लेंगे.

आख़िर में दोनों नेताओं के बीच कड़ा मुक़ाबला हुआ. अटल बिहारी बाजपाई को क़रीबी अंतर से शिकस्त मिली. सुभद्रा जोशी को एक लाख दो हज़ार दो सौ साठ वोट मिले जबकि अटल बिहारी बाजपाई को एक लाख और दो सौ आठ वोट ही मिल सके. हालाँकि 1967 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी बाजपाई ने सुभद्रा जोशी को बलरामपुर लोकसभा सीट से हरा दिया.

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Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

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