आज हम आपको बताने जा रहे हैं इल्मा अफ़रोज़ के बारे में. उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से ताल्लुक़ रखने वाली इल्मा ने ज़िन्दगी में ख़ासा संघर्ष किया. उन्होंने लोगों के घरों में जाकर बर्तन तक माँजे. संघर्ष कितना ही कड़ा रहा हो उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने खेतों में भी काम किया और जब मुश्किल आयी तो दूसरों के घरों में बर्तन भी माँजे. आज वो आईपीएस अफ़सर हैं. जीवन के संघर्ष के साथ साथ पढ़ाई जारी रखना अपने आप में एक कामयाबी है. इस कामयाबी में चार चाँद तब लग जाते हैं जब आप अफ़सर बन जाएँ.

एक मौक़ा यूँ भी था कि वो चाहतीं तो विदेश में सेटल हो सकती थीं लेकिन उन्होंने अपने वतन को चुना. उन्होंने अपनी मिट्टी और अपनी माँ के पास रहने का फ़ैसला किया. इल्मा की ज़िन्दगी तब बदल गई जब 14 साल की कम उम्र में उनके पिता चल बसे. इल्मा का भाई उनसे दो साल छोटा है और जब पिता की मौत हुई तो मुसीबतें पहाड़ बनकर टूट पड़ीं. इल्मा की अम्मी के सामने बड़ी मुश्किल थी.

कई लोगों ने ये भी सलाह दी कि वो अपनी ज़िम्मेदारी से फ़ारिग़ हो जाएँ इसलिए वो अपनी बिटिया की शादी कर दें. इल्मा की माँ ने लेकिन कभी ऐसा न किया और अपने मन के हिसाब से ही चलती रहीं. उन्होंने अपने पैसों से बेटी को पढ़ाया. इल्मा की मेहनत भी रँग लायी और स्कालरशिप पाने में कामयाब रहीं.इल्मा की पूरी हायर स्टडीज़ स्कॉलरशिप्स के माध्यम से ही हुई. इल्मा ने बताया कि वह अपने सेंट स्टीफेन्स में बिताए सालों को जीवन का श्रेष्ठ समय मानती हैं.

वो बताती हैं कि वहाँ उन्होंने बहुत कुछ सीखा और इधर बेटी को दिल्ली भेजने के कारण उनकी माँ ने ख़ूब खरी-खोटी सुनी कि बेटी हाथ से निकल जायेगी, उसको पढ़ाकर क्या करना है वगैरह-वगैरह। पर उन्हें अपनी बेटी पर पूरा विश्वास था, उन्होंने किसी की नहीं सुनी। सेंट स्टीफेन्स के बाद इल्मा को मास्टर्स के लिये ऑक्सफोर्ड जाने का अवसर मिला। उसके बाद तो गाँव वालों और रिश्तेदारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी और यहाँ तक यह भी कह दिया गया कि लड़की गयी हाथ से, अब वापस नहीं आने वाली है।

यहाँ इल्मा कि अम्मी इतनी बातें सुन रही थी, वहाँ इल्मा यूके में अपने बाक़ी खर्चें पूरे करने के लिये कभी बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रही थी, कभी छोटे बच्चों की देखभाल का काम करती रही। यहाँ तक कि लोगों के घर के बर्तन भी धोये पर कभी घमंड नहीं किया कि सेंट स्टीफेन्स की ग्रेजुएट कैसे ये छोटे-मोटे काम कर सकती है। इसके बाद इल्मा एक वॉलेंटियर प्रोग्राम में शामिल होने न्यूयॉर्क गयीं, जहाँ उन्हें बढ़िया नौकरी का ऑफर मिला। इल्मा चाहती तो यह ऑफर ले लेती और विदेश में ही बस जाती, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। एक साक्षात्कार में वे कहती हैं कि “मुझ पर, मेरी शिक्षा पर पहले मेरे देश का हक़ है, मेरी अम्मी का हक़ है, अपनों को छोड़कर मैं क्यों किसी और देश में बसूं”

अपने कामयाब करीयर को छोड़ वो वापिस भारत आ गईं और उन्होंने UPSC का मन बनाया. उनके भाई और उनकी माँ ने उन्हें इसके लिए प्रोत्साहन दिया. इल्मा कहती हैं कि जब वे गाँव वापस आती थी तो गाँव के लोगों को लगता था बेटी विलायत से पढ़कर आयी है, अब तो सारी समस्याएँ ख़त्म कर देगी। किसी का राशन कार्ड बनना है तो किसी को किसी सरकारी योजना का लाभ लेना है। हर कोई इल्मा के पास एक उम्मीद लेकर आता था।

इल्मा को भी लगा कि यूपीएससी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसके द्वारा वे अपने देश सेवा का सपना साकार कर सकती हैं। बस इल्मा जुट गयी तैयारी में और आखिरकार इल्मा ने साल 2017 में 217वीं रैंक के साथ 26 साल की उम्र में यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली। जब सर्विस चुनने की बारी आयी तो उन्होंने आईपीएस चुना। बोर्ड ने पूछा भारतीय विदेश सेवा क्यों नहीं तो इल्मा बोली, “नहीं सर मुझे अपनी जड़ों को सींचना है, अपने देश के लिये ही काम करना है” इल्मा के क़रीबी बताते हैं कि इल्मा ने संघर्ष ख़ूब किया और उसी बल पर उन्हें कामयाबी मिली लेकिन उन्होंने कभी इस पर घमण्ड नहीं किया.इल्मा की कहानी देश की बेटियों के लिए मिसाल है, हमारी तरफ़ से उन्हें सलाम.

By Arghwan Rabbhi

Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

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