लखनऊ: उत्तर प्रदेश में इन दिनों राजनीतिक हलचलें बढ़ गईं हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार के बारे में कई अटकलें लगाई जा रही हैं। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से बीजेपी को हार का स्वाद चखना पड़ा उससे विपक्षी दलों का हौसला बढ़ गया है। विपक्षी दल नई नई रणनीतियां बनाकर यूपी सरकार को घेरने की कोशिशें लगातार कर रहे हैं।

बीजेपी यह जानती है कि उत्तर प्रदेश दुबारा से जितना कितना ज़रूरी है। यूपी सरकार के कई मंत्रियों और विधायक सीएम योगी आदित्यनाथ से नाराज़ है। कई स्तरों पर शिकायतें सामने आ रही है। लेकिन अगर सूत्रों की माने तो केंद्रीय नेतृत्व ने जिस विश्वास के साथ उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी योगी आदित्यनाथ को दी हैं वो उसे अच्छे से निभा रहे हैं। ऐसा अनुमान है कि जनवरी में यूपी विधानसभा चुनाव का एलान हो सकता है।

बीते दिनों बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष ने प्रभारी राधामोहन सिंह के साथ राज्य सरकार के कई मंत्रियों और विधायकों से बातचीत की थी।जिसके बाद योगी सरकार को लेकर कई शिकायतें और नाराज़गी सामने आई थी। कार्यकर्ताओं की अनदेखी की भी शिकायतें सामने आईं। जिसके बाद ये अटकलें लगाई जा रहीं थी कि, आने वाले चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा बदल सकता है।

लेकिन बीजेपी के सूत्र प्रदेश सरकार व संगठन में किसी बड़े परिवर्तन की संभावना और मुख्यमंत्री उम्मीदवार के चेहरे में बदलाव को खारिज करते हैं। सूत्रों के अनुसार चाहे कितनी भी शिकायतें हों लेकिन कोरोना काल मे जब बहुत से जनप्रतिनिधि घर के अंदर छिपे थे तब सीएम योगी आदित्यनाथ ने सक्रियता दिखाते हुए दौरें किये और जनता का हौसला बढ़ाया।

तब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी दूर रहे और कांग्रेस प्रभारी प्रियंका ट्विटर पर ही दिखीं। मतलब कि योगी आदित्यनाथ ने कोविड-19 की पहली लहर को कंट्रोल और दूसरी लहर को संभालने में सक्रियता दिखाई। एक बड़ा राज्य होने के बावजूद अन्य राज्यों की तुलना में यहां संक्रमण भी कम हुआ। हिंदुत्व के मुद्दे में योगी बिल्कुल फिट बैठते है। सूत्रों के अनुसार, जातिगत समीकरण के आधार पर कुछ बदलाव किए जा सकते है मगर मुख्यमंत्री चेहरे का बदलाव नही होगा।

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