फू’हड़ता को नया आयाम देती ‘कबीर सिंह’ से शाहिद कमा रहे हैं नाम..

इन दिनों आम चर्चा का विषय बनी हुई है शाहिद कपूर अभिनीत फ़िल्म कबीर सिंह, जहाँ एक ओर लोग इसमें शाहिद के किरदार को सराह रहे हैं वहीं दूसरी ओर ये आलोचना भी चल रही है कि इस तरह की फ़िल्में नारी वि’रोधी वातावरण को बढ़ावा देती है। शाहिद कपूर को भी इस तरह के किरदार निभाने के लिए एक ओर जहाँ तारीफ़ मिल रही है वहीं उन्हें कटु आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है। सबसे पहले तो स्त्री मुद्दे पर मुखर होकर बोलती आयीं गायिका सोना मोहापात्रा ने शाहिद को ऐसे किरदार निभाने के लिए क़सू’रवार क़रा’र दिया वहीं अब सेंसर बोर्ड की एक सदस्या ने भी शाहिद को ऐसा किरदार चुनने के लिए सवालों के कटघरे में खड़ा किया है।

देखा जाए तो जैसी फ़िल्म कबीर सिंह की कहानी है वो पूरी तरह से महिलाओं के प्रति ख़’राब व्यव’हार को ग्लैमराइज़ करके युवाओं के सामने परोसने का काम तो करती ही है। जहाँ किसी ऐसे व्यक्ति को, जो महिला को अपनी मनमर्ज़ी के अनुसार ट्रीट करता है, हीरो के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, तो समाज में इसका ग़लत संदेश मिलता है। सभी जानते हैं कि फ़िल्मों का आम जीवन पर कितना गहरा असर पड़ता है। फ़िल्म एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा कोई भी संदेश बड़े पैमाने पर लोगों के बीच पहुँचाया जा सकता है। अब ये संदेश कैसा होगा इसका फ़ैसला स्क्रिप्ट राइटर, फ़िल्म निर्माता के साथ-साथ फ़िल्मी कलाकारों की ज़िम्मेदारी भी बनती है। जिस समाज के लोगों के मनोरंजन का बीड़ा फ़िल्मी दुनिया ने उठाया है उनके प्रति एक कर्तव्य भी बनता है।

Sona Mohapatra- Shahid Kapoor

यहाँ एक सवाल सेंसर बोर्ड पर भी खड़ा होता है कि उनकी नज़रों से इस तरह की फ़िल्में कैसे निकल जाती हैं?..क्या उनका समाज के प्रति कोई कर्तव्य नहीं बनता? जहाँ वो एक ओर धार्मिक भे’दभाव बढ़ाने वाली बात कहकर कई फ़िल्मों पर बैन लगा देते हैं वहीं उन्हें कबीर सिंह जैसी फ़िल्म से समाज में महिलाओं के प्रति बढ़ने वाले अप’राधों की रत्ती भर फ़िक्र नहीं होती। सेंसर बोर्ड को अपनी इस दोहरी मानसिकता की ओर झाँकना आवश्यक है। वहीं फ़िल्म के हीरो- हीरोईन जिन्हें आज का युवा अपना रोल मॉडल मानता है उनका कर्तव्य भी बनता है कि महज़ पैसों की लालच में अपने फ़ैन्स के सामने ग़लत चीज़ों को ग्लैमराइज़ करके सही न बनाएँ।

Shahid Kapoor

फ़िल्म इंडस्ट्री का काम भी सिर्फ़ टैक्स चुकाकर पूरा नहीं हो जाता, फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि मनोरंजन के नाम पर वो समाज में गंदगी को न बढ़ाएँ। यही नहीं मनोरंजन के नाम पर फूहड़ता, अपराध और विकृत मानसिकता जैसी बातों को प्रोत्साहन न देना भी फ़िल्मी दुनिया के लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है। समाज में आए दिन महिलाओं के ख़ि’लाफ़ अप’राधों की संख्या में वृद्धि हुई है, इस बात से भी समाज और फ़िल्मी दुनिया के लोग अनजान नहीं हैं कि अब देश में बच्चियों तक से दु’ष्कर्म होने लगे हैं, कोई लड़की किसी बात के लिए मना कर दे तो उस पर तेज़ा’ब फेंका जाता है। ऐसे में इन घटनाओं को ग्लैमराइज़ करने से रोकना फ़िल्मी दुनिया के लोगों के हाथ में है।

हाल ही में हुए मी टू कैंपेंन ने बॉलीवुड की चमकीली परत हटाने में कसर नहीं छोड़ी थी। ग्लैमर और चकाचौंध से भरी बॉलीवुड की गलियाँ लड़कियों के लिए कितनी तंग है ये बात सभी के सामने खुलकर आ गयी जिसे फ़िल्मी दुनिया से जुड़े अधिकांश लोगों ने ढँकने की कोशिश की। यहाँ एक बात आम जनता के समझने की भी है कि हर हीरो या हीरोईन सिर्फ़ एक किरदार निभाते हैं वो निजी ज़िंदगी में भी उतने ही भले हों क़तई ज़रूरी नहीं है। किसी भी काल्पनिक किरदार की ओर बह जाना और उसे रोल मॉडल मानकर जीने लगना सही नहीं है।

Kiyara Adwani- Shahid Kapoor

कबीर सिंह जैसी फ़िल्म के चलने का एक बहुत बड़ा कारण ये है कि इसकी भरपूर आलोचना हो रही है और लोग इस आलोचना को परखने के लिए फ़िल्म की ओर उत्सुक हो रहे हैं, यहाँ सोशल मीडिया में आलोचना करने वालों को सोचने की ज़रूरत है कि वो आलोचना करके फ़िल्म को बढ़ावा ही दे रहे हैं। समाज के हित में यही है कि ऐसी फ़िल्मों को सिरे से ख़ारिज किया जाए ताकि इस तरह की फ़िल्में और न बने। यही नहीं ऐसी फ़िल्म बनाने वालों को भी भारी नुक़सान हो ताकि अगली बार वो सोच समझकर फ़िल्म बनाएँ। कोई भी समाज यूँ ही नहीं बदलता, बदलाव की शुरुआत ख़ुद से करनी होती है। अगर कबीर सिंह जैसी फ़िल्म हिट होती है तो ये एक समाज के तौर पर हमारा पतन है।

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Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

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