प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह लगातार चुनावी रैली कर रहे हैं.इसके साथ ही दूसरे बड़े नेता भी रैली कर रहे हैं. भाजपा के छोटे-बड़े हर नेता की रैली में जो मुद्दा ज़ोर-शोर से सुनने को मिल रहा है वो है राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा. चुनाव आयोग ने हालाँकि नेताओं से कहा है कि वो सेना का इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए न करें लेकिन भाजपा नेता लगातार इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ते नज़र आ रहे हैं. मोदी लगभग हर रैली में पुलवामा और बालाकोट का ज़िक्र कर रहे हैं और ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि सिर्फ़ उनकी पार्टी की सरकार ही भारत को सुरक्षित सीमाएँ दे सकती है.

परन्तु कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर भाजपा कोई चर्चा नहीं कर रही है. हालत तो ये है कि अगर भाजपा के किसी नेता से इस विषय पर सवाल कर दिया जाये तो वो बहस को छोड़ देता है. भाजपा २०१४ में जब सत्ता में आयी थी तब उसने कई वादे किए थे. इन वादों को लेकर विपक्ष दावा करता है कि पूरे नहीं हुए लेकिन हम आज उन कुछ कामों की बात करेंगे जो मोदी सरकार में हुए हैं और जब ये योजनाएँ आयी थीं तब भाजपा ने इन्हें क्रांतिकारी योजनाएँ बताया था.

नोटबंदी: 8 नवम्बर 2016 को अचानक ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि आधी रात के बाद से पुराने 500 और 1000 के नोट नहीं चलेंगे. इस नीति पर कई तरह के सवाल उठे, लोगों को कई क़िस्म की परेशानियाँ हुईं. बैंकों के बाहर लम्बी-लम्बी लाइन्स लगीं. इसमें 100 से अधिक लोगों की जान भी चली गई. परन्तु प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया कि 50 दिन में सब मुश्किल दूर हो जाएगी. दावा ये किया गया था कि नोटबंदी से कालाधन वापिस आ जाएगा, नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी. आँकड़ों की मानें तो 99.9% से भी अधिक नोट वापिस आ गये. इसका मतलब नक़ली नोटों की जो बात की जा रही थी वो उतने बड़े स्तर पर थे ही नहीं. आतंकवाद की कमर टूटने की बात तब सही मानी जाती जब उसके बाद कोई आतंकी हमला न होता लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ. यही वजह है कि भाजपा इस मुद्दे को चुनाव में लेकर नहीं जाना चाहती.

GST: ‘माल और सेवा कर’ जब लागू किया गया था तब भी इस तरह की बात की गई थी कि ये क्रांतिकारी बदलाव है और इसके लागू होते ही देश का व्यापार जगत ख़ुशी से झूम उठेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. GST के जल्दबाज़ी में लागू किए जाने की वजह से कई छोटे व्यापार टूट गए. ऐसा नोटबंदी में भी हुआ था. व्यापारी वर्ग इस वजह से थोड़ा नाराज़ भी है.

नौकरी: २०१४ के चुनाव प्रचार में भाजपा ने ज़ोर-शोर से कहा था कि उनकी सरकार हर साल २ करोड़ युवाओं को नौकरी देगी लेकिन ऐसा भी नहीं हो सका. ऊपर से जो बेरोज़गारी के आंकड़े आए हैं वो चौंकाने वाले हैं. यही वजह है कि भाजपा इस मुद्दे पर भी कोई बहस नहीं चाहती.

भाजपा की किसी भी रैली में इन मुद्दों पर कोई बात नहीं कर रहा है. भाजपा के नेता पूरी तरह से चुनाव को राष्ट्रीय सुरक्षा पर केन्द्रित रखना चाहते हैं. वहीँ कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दल सेना के शौर्य की तो तारीफ़ कर रहे हैं लेकिन भाजपा से ये सवाल कर रहे हैं कि आख़िर वो इन मुद्दों पर ख़ामोश क्यूँ है.

(अरग़वान रब्बही)

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