अस्सलाम ओ अलैकुम दोस्तों, हम उम्मीद करते हैं की आप अच्छे से होंगे. आज हम आपको एक बार फिर सीख की बात बताने जा रहे हैं. ऐसा वाक़या जिससे आप बहुत कुछ सीख सकते हैं. जब हज़रत अबूज़र रज़ि अ० को पहले पहल हुज़ूरे अक्दस स० अ० की नबूवत की ख़बर पहुंची तो अपने भाई को तहकीक के लिए मक्का भेजा। भाई ने आकर बताया कि मैने उनको अच्छी आदतों और उम्दा अख्लाक का हुक्म करते देखा। और ऐसा कलाम सुना जो न शेर है और न काहिनो का कलाम है।

इसके बाद अबू ज़र रज़ि अ० खुद मक्का तशरीफ़ लाये और सीधे मस्जिद ए हराम मे गये। हुज़ूर स० अ० को पहचानते न थे और किसी से पूछना मसलिहत के ख़िलाफ़ समझा।चुनांचे शाम तक इसी हाल मे रहे।शाम को हज़रत अली रज़ि अ० ने देखा कि एक मुसाफिर है ,मुसाफिरों ,गरीबों , परदेसियों की ज़रूरत पूरी करना इन हज़रात का वस्फ़ था।सो हज़रत अली रज़ि अ० ,आप को अपने घर ले गये ,मेज़बानी की लेकिन यह पूछना ज़रुरी न समझा कि कौन हो और क्यों आये हो ?

मुसाफिर ने भी अपना राज़ ज़ाहिर न किया। दूसरे दिन अबु ज़र रज़ि अ० फिर मस्जिदे हरम तशरीफ़ ले गये और फि़र शाम को हज़रत अली ने उनकी मेज़बानी की। तीसरे दिन भी ऐसा ही हुआ। लेकिन अब हज़रत अली रज़ि अ० ने दरयाफ्त कर लिया कि यहाँ किस काम से आये हो, तो उन्होंने अपने आने का सबब उनको बता दिया। हज़रत अली रज़ि० अ० ने उनको यकी़न दिलाया कि हुज़ूर स० अ० बेशक अल्लाह के नबी हैं।

अगली सुबह हज़रत अली रज़ि अ० के साथ हज़रत अबू ज़र भी आप स० की खिदमत मे हाज़िर हुए। आप स० अ० का ऐसा असर हुआ कि उसी वक्त ईमान ले आये। हज़रत अबू ज़र उसी वक्त मस्जिदे हरम तशरीफ़ ले गये और बुलंद आवाज़ से कलमा पढ़ने लगे।फिर क्या था चारों तरफ़ से लोग उठे और इस क़दर मा-रा कि ज़-ख्मी कर दिया।आप स० अ० के चचा हज़रत अब्बास रज़ि अ० जो उस वक्त तक मुसलमान नहीं हुए थे,उनको बचाने के लिए उनके ऊपर लेट गये।फ़रमाने लगे यह शख़्स क़बीला ग़िफ़ार का है जो मुल्क शाम के रास्ते मे पड़ता है। तुम्हारी तिजारत वगैरह मुल्के शाम के साथ है।

अगर यह शख्स म-र गया मो मुल्के शाम आना जाना बंद हो जाएगा। हज़रत अब्बास रज़ि अ० की बात सुनकर लोगों ने उनको छोड़ दिया।इतनी तकलीफ सह कर ईमान का जोश ऐसा था कि अबू ज़र रज़ि अ० ने दूसरे दिन भी उसी तरह कलमा पड़ा। फिर से उसी तरह लोगों ने उन पर ज़ु-ल्म किया । हज़रत अब्बास रज़ि अ० ने फिर से आकर उनको बचाया।

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