तू, तुम और आप…

May 22, 2018 by No Comments

“एक भाषा व्याकरण और भाषा विज्ञान से कहीं बड़ी है. यह एक जाति और संस्कृति की प्रतिभा का काव्य प्रमाण है जो उन विचारों और प्रशंसकों का जीवित अवतार है जिसने इसे ढाला है” – जवाहर लाल नेहरु, भारत की खोज

भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक वर्गीकरण का आधार, दुनिया में कहीं और पाए जाने वाले वर्गीकरण से पूर्णतः भिन्न है क्योंकि यहाँ पर वर्गीकरण के साथ विभाजन भी है, यह दोनों सिद्धांत पारस्परिक तौर पर निर्भर हैं और यह विभाजन ही तय करता है कि आप मानव समाज में कितने हक़दार है कि आपको मानवीय व्यवहार मिले. असल में, वर्गीकरण के यह तत्त्व समाज में ही निवास करते है. इसीलिए इनका उभार समाज के सिर्फ कुछ पहलुओं तक सिमित नहीं होता, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तरीक से यह हमारे व्यवहार को निर्देशित व संचालित करती है जैसे कि वर्तमान में संवैधानिक तौर पर हर नागरिक कानून के समक्ष समान है पर इन कानूनों को क्रियानवित करवाने वाला व्यक्ति निष्पक्षता के साथ समानता के सिद्धांत का निर्वहन करे, यह संशयात्मक है.

अब अगर इसी तरह से भाषाई लिंग का अवलोकन करे तो यह तटस्थ नहीं, पुरुषवादी है. यह प्रतिबिम्बित करती है उस हावी सोच को जिसमें पुरुष वर्ग सशक्त एवं प्रभावशाली है जैसे चिमटी या चिमटा, पत्ती-पेड़ आदि उदाहरण है जो अपरोक्ष रूप से बोध कराती है की छोटी वस्तुएं स्त्री सम्बन्धित है और बड़ी पुरुष से. अब अगर एक विद्यालय कि कक्षा का उधाहरण लें, जिसमें बच्चे और बच्चियां है और वो शोर मचा ‘रहें है’ और अध्यापिका कहती है कि ‘बच्चों’ चुप हो जाओ या कहे कि ‘बच्चों’, बताओ ये क्या है.

फिलहाल में ‘तू’ का प्रयोग सम्बोधन में बढ़ा है और इसका प्रयोग दर्शाता है कि सम्बन्धों में निकटता कितनी है परन्तु भिन्न परिस्थिति में तू का इस्तेमाल आपको आहत भी कर सकता है.

१. तू सुन
२. तुम सुनो
३. आप सुनिए
उपरोक्त में अगर सम्बोधन हेतु कोई विकल्प चुना जाये तो वह तृतय होगा, पर क्या घर के नौकर, जमादार या रिक्शेवाले, सब्जीवाले से भी कोई यही कहेगा या उम्रदराज या हाई-क्लास व्यक्ति अपने से निम्न सामाजिक प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति से भी ऐसे ही कहेगा और हमेशा कहेगा ?

क्यों ‘आप’ के इलावा ‘तुम’ और ‘तू’ आये इसका सीधा अर्थ यही हो सकता है कि समाज के प्रतिष्ठावान व्यक्ति अपने से निम्न स्तरीय को नीचा दिखाना चाहते थे और चमरों को ‘तुम’ कहना भी प्रदूषित था इसीलिए ‘तू’ आया. क्रोध, आवेगवश, प्रभुत्व स्थापित करने हेतु ‘तुम’ या ‘तू’ ही इस्तेमाल में लाया जाता है क्योंकि ‘आप’ का इस्तेमाल समता स्थापित करता है परन्तु हमारे विभाजित समाज में ऊँच-नीच, पवित्र-प्रदूषित, श्रेष्ठता-हीनता जैसे धारणाओं से पूर्वाग्रषित है जिसे बिना चोट पहुचाये, तोड़े हम समता मुलक या मानवीय समाज की ओर अग्रसर नहीं हो सकते हैं. दुर्भावना की जड़ें हमारी सोच में इतनी पैठ बना चुकी है कि हम अपना गाल कुत्ते से चटा सकतें है, उसकी थाली से खाना खा सकतें है, उसके बिस्तर पर साथ सो भी सकतें है पर सामाजिक व्यवहार में घिन आएगी, घुटन होगी अगर समाज कि उस वर्ग के व्यक्ति कि समकक्ष ही आ जाये जिसे कोई चमार, दलित, पिछड़ा आदि कहते है, मिलना-बोलना-खाना-छूना तो सोचने में कईयों के रक्तचाप में वृद्धि हो जाये.

पर भाषा और बोली के फर्क के महत्व को समझना होगा, क्योंकि समाज मुख्यधारा से क्रियान्त्वित होता है. उसी से सम्बद्ध एक क़िस्सा है, नया तो नहीं पर पुराना कह नहीं सकते. सूबे की एक मुख्यमंत्री थी, उनसे प्रदेश के पश्चिमी भाग से उनके दल एक विधायक मिलने आया, फ़ाइलें-काम-सिफारिश-शिकायत सब लेकर आया, मुलाक़ात खत्म हुई, विधायक महोदय चले गये,उनके पीछे पहुँचा उनका दल से निष्कासन का हुक्म.उनके उनकी दल से विदाई का कारण ये था कि विधायक अपने क्षेत्रीय बोली में बोल रहे थे और यही उनकी विदाई का कारण बन गया.

[इस लेख को वैभव मिश्रा ने लिखा है, लेखक अपने विचारों में आज़ाद है]

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