लखनऊ: उत्तर प्रदेश के चुनाव नजदीक आते ही सूबे में राजनैतिक दलों ने जोड़ तोड़ की राजनीति का गुणा गणित करना शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश का चुनाव मुद्दों पर कम और जा’तियों पर ज्यादा ल’ड़ा जाता है और यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति देश के अन्य राज्यों से अगल है। भाजपा को 2017 के चुनावों में जीत का स्वाद चखने में स्वर्ण,अति दलित और अति पिछड़ी जातियों का महत्वपूर्ण योगदान था।

वहीं 2007 के चुनावों में बसपा ने दलित ब्राह्मण गठजोड़ करके मायावती को मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलवाई। वही सपा का M+Y गठजोड़ सत्ता पाने का एक महत्त्वपूर्ण श’स्त्र रहा है। 2022 में होने वाले सूबे के विधानसभा चुनाव में एक अलग खिचड़ी छोटे दलों द्वारा पकाई जा रही है। सुभसपा के अध्यक्ष व भागीदारी संकल्प मोर्चा के संयोजक ओमप्रकाश राजभर इन दिनों कई छोटे दलों को एक मंच पर लाकर एक गठबंधन बनाने की कवायद कर रहे हैं।

इस सिलसिले में ओमप्रकाश राजभर की प्रसपा प्रमुख शिवपाल यादव, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह,आईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी से बातचीत चल रही है। जानकारों का मानना है कि अगर ये गठजोड़ होता है तो इसका नु’कसान सपा को मुख्य रूप से उठाना पड़ सकता है। इसका कारण हैं ओवैसी और शिवपाल यादव। क्योंकि ओवैसी की नज़र जहां मुस्लिम वोटरों पर हैं तो वहीं शिवपाल यादव जितना भी वोट पाएंगे उससे कहीं न कहीं सपा का ही नु’कसान होगा। ओवैसी M तो शिवपाल यादव Y फैक्टर को को में सें’ध लगा सकते हैं।

हालांकि ओवैसी और शिवपाल यादव की पार्टी का उभार बहुत ज्यादा उत्तर प्रदेश में दिखाई नही देता है। हाँ इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि पिछले कुछ सालों में मुस्लिम युवाओं में ओवैसी की तरफ रुझान बढ़ा है। पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने आरजेडी को हरवाने में एक मुख्य भूमिका अदा की थी। उत्तर प्रदेश में ही आज़मगढ़ में एक जनसभा को ओवैसी सम्बोधित कर चुके हैं। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि आईएमआईएम मुस्लिम मतदाताओं को खींचने का प्रयास जरूर करेगी और इसका खा’मियाजा सपा को उठाना पड़ सकता है।

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