UAE के बाद इस अरब देश ने भी दिया फ़िलिस्तीन को धोका, इज़राइल से..

September 11, 2020 by No Comments

फ़िलिस्तीन-इज़राइल के बीच विवाद अक्सर अरब-इज़राइल विवाद भी कहा गया. इसका कारण ये था कि इतिहासकार इसे अरब राष्ट्रवाद और सियोनवाद के बीच ल’ड़ाई मानते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में ये देखा गया है कि अरब देश फ़िलिस्तीन को भूल गए हैं. हालाँकि 1948 से ही ये बात मिस्र और सीरिया के नेता कहते रहे कि फ़िलिस्तीन के लिए हम सं’घर्ष करते हैं लेकिन सऊदी अरब, UAE जैसे देश कुछ नहीं करते. यही वजह रही कि एक वक़्त के बाद मिस्र को ये लगने लगा कि जितनी बार वो इज़राइल से भिड़ता है कोई और उसका साथ उस तरह नहीं देता, यही वजह रही सन 1979 में इज़राइल के साथ मिस्र ने शांति समझौता कर लिया.

इस समझौते की बड़े स्तर पर निंदा हुई क्यूँकि फ़िलिस्तीनी समुदाय के लिए सं’घर्ष करने वाला देश अब अपने फ़ायदे-नुक़सान देखने लगा. यही वो समय है जब फ़िलिस्तीन में चरमपंथ बढ़ा. जानकार मानते हैं कि इस समय तक फ़िलिस्तीन के लोगों को लगने लगा कि इस सं’घर्ष में उनका साथी कोई और नहीं होगा, उन्हें सब ख़ुद ही करना होगा. इसी वक़्त यासिर अराफ़ात की पॉपुलैरिटी भी बढ़ी. सं’घर्ष चलता गया और सं’घर्ष के बीच “ओस्लो एकॉर्ड” या “इज़राइल-जॉर्डन ट्रीटी-1994” भी हुई. 1994 से लेकर 2020 तक के समय में किसी भी अन्य अरब देश ने इज़राइल से समझौता नहीं किया.

इज़राइल ने जिस तरह से फ़िलिस्तीनी ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया है, लोगों पर ज़ुल्म किया है और अरब लोगों को दबाया है वो किसी से छुपा नहीं है. परन्तु 2020 में जाने क्या हुआ कि UAE ने इज़राइल से “अब्राहम एकॉर्ड” कर ली. सबसे अहम् बात ये है कि इस एकॉर्ड से पहले न तो UAE ने फ़िलिस्तीन को सूचना देना बेहतर समझा और न ही फ़िलिस्तीन के भविष्य को लेकर कोई चिंता ज़ाहिर की. इसी रास्ते पर बहरीन भी चल पड़ा है. सऊदी अरब के नज़दीक पड़ने वाला इस अरब देश ने भी अब इज़राइल से समझौता कर लिया है.

अरब लीग ने भी फ़िलिस्तीन को एक तरह से छोड़ ही दिया है. फ़िलिस्तीन ने जब इस पूरे मामले पर नाराज़गी जताई तो अरब लीग ने साफ़ कर दिया कि हर देश अपने समझौते करने के लिए फ़्री है. इसका ये भी अर्थ समझा जा सकता है कि जल्द ही बाक़ी अरब देश भी इज़राइल के साथ सम्बन्ध ठीक कर सकते हैं. पश्चिम एशिया की राजनीति अगर इस दिशा में जा रही है तो इसका सबसे बड़ा कारण अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी हैं. ट्रम्प ने लगातार कोशिश की है कि वो इज़राइल के लिए राहें आसान कर दें ताकि उनकी चुनावी राह आसान हो जाए.

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