तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन का सम्मान पूरी दुनिया में है. उन्हें इस्लामिक जगत का बड़ा नेता माना जाता है. उनके समय में तुर्की ने अप्रत्याशित विकास किया है. उन्होंने बार बार ये कहा है कि इस्लामिक वर्ल्ड को अपनी आपसी समझ को बेहतर करना चाहिए और एका क़ायम करना चाहिए. बुधवार के रोज़ उन्होंने इस बात को दोहराते हुए कहा कि इस्लामिक वर्ल्ड को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर लिया जाता है क्यूँकि मुस्लिम समाज में एका नहीं है.

उन्होंने कहा कि जिन देशों में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं उन देशों पर आतं’कवाद, गृह युद्ध और नफ़रत के ख़तरे हैं. उन्होंने कहा कि आ’तंकी संगठन हमारे बाज़ारों, मस्जिदों और स्कूलों पर ख़ून बहाती हैं. उन्होंने कहा कि मुस्लिम के पास ताक़त नहीं है, वो एक्टिव भी नहीं हैं और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर उनका नेतृत्व भी नहीं है. एर्दोआन ने कहा कि इस्लामिक देशों के पास में भविष्य के लिए कोई योजना नहीं है.उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की सिक्यूरिटी कौंसिल में एक भी मुस्लिम देश नहीं है और ये अन्याय वाला सिस्टम नहीं चल सकता.

उन्होंने कहा कि हमें ख़ुद पर भरोसा करना होगा.. आर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन को अपनी ताक़त को समझना होगा. उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र बोस्निया-हर्जेगोविना, रवांडा, और सीरिया की समस्याओं को नहीं सुलझा सका तो हमारी परेशानियों को कैसे सुलझाएगा. उन्होंने एक बार फिर इस बात पर ज़ोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र का री-स्ट्रक्चर किया जाए. एर्दोआन ने संयुक्त राष्ट्र से मांग की कि 15 मार्च को इंटरनेशनल सॉलिडेरिटी डे अगेंस्ट इस्लामोफ़ोबिया घोषित किया जाए.

तुर्की ने इस बात पर चिंता जताई है कि पश्चिमी देशों में मुस्लिम-विरोधी मानसिकता बढ़ रही है. तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया चाहते हैं कि इससे निपटने के लिए एक कम्युनिकेशन सेंटर की स्थापना की जाए. पिछले कुछ समय में देखा गया है कि यूरोप के कई देशों में कट्टर दक्षिण पंथी गुटों ने मुस्लिमों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाई है. एर्दोआन ने फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर भी अपना पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि फ़िलिस्तीनी लोगों को जीने और शांति से काम करने की आज़ादी न देकर इज़राइल सारी दुनिया और क्षेत्र के भविष्य को चिंता में डाल रहा है.

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