तुर्की की ता’क़त के आगे क्यूँ बेबस दिख रहा है रूस, अज़रबैजान के पक्ष में एरदोगन ने…

October 13, 2020 by No Comments

अर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच नागोर्नो-काराबाख़ क्षेत्र को लेकर जं’ग चल रही है. इस क्षेत्र को अन्तराष्ट्रीय कम्युनिटी अज़रबैजान का मानती है लेकिन 1992 के बाद से इस पर आर्मेनिया का क़ब्ज़ा है. इस क़ब्ज़े को छुड़ाने के लिए अज़रबैजान दबाव बनाता रहा है वहीं आर्मीनिया दावा करता है कि चूंकि यहाँ अर्मेनियाई लोगों की आबादी ज़्यादा है इसलिए ये उसे मिलना चाहिए. एक समय अर्मीनिया छोटा देश होने के बाद भी मज़बूत था क्यूँकि उसके पक्ष में रूस खुलकर खड़ा रहता था लेकिन अब रूस ख़ामोश है.

एक तरफ़ रूस ख़ामोश है तो दूसरी तरफ़ तुर्की अज़रबैजान के पक्ष में खुलकर खड़ा दिख रहा है. ये बात अर्मीनिया को परेशान भी कर रही है और यु’द्ध में कमज़ोर भी कर रही है. आर्मीनिया जानता है कि वो तुर्की के हथि’यारों के सामने बहुत दिनों तक टिक नहीं सकता इसलिए उसे रूस के समर्थन की दरकार है. रूस लेकिन अब तक इस मामले में किसी का पक्ष लेता नहीं दिख रहा. इसका कारण ये है कि पिछले रूस जानता है कि पिछले 15 सालों में तुर्की ने अपनी सैन्य क्षमता का काफ़ी विस्तार कर लिया है.

वो आर्मीनिया का समर्थन करने के लिए तुर्की जैसे मज़बूत देश से नहीं भिड़ना चाहता. रूस को मालूम है कि ईराक़, सीरिया जैसे देशों में अगर ख़ुद को प्रभावी बनाये रखना है तो तुर्की से भिड़ना ग़लत होगा. अर्मीनिया शुरूआती ल’ड़ाई में बुरी तरह पिछड़ता दिख रहा है और उसके नेता हर तरह की कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह रूस इस जं’ग में आ जाए. अर्मीनिया के कुछ नेता चाहते हैं कि समझौता ही हो जाए लेकिन बहुत नुक़सान न हो और सम्मान बना रहे.

इसको लेकर तुर्की ने साफ़ कर दिया है कि कोई भी समझौता तभी होगा जब आर्मेनिया क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करे और अज़रबैजानी इलाक़ों से क़ब्ज़ा छोड़े. तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने इस बाबत कहा है कि रूस और यूरोप पिछले 30 सालों से इस मामले को सुलझा नहीं सके हैं. इस जं’ग के ज़रिए अगर अज़रबैजान अपनी ज़मीन पर से अर्मेनियाई क़ब्ज़ा छुड़ा लेता है, तो इसमें तुर्की की बड़ी कूटनीतिक जीत हो सकती है. अगर ऐसा होता है तो तुर्की क्षेत्र में बड़ी ताक़त बनकर उभर जाएगा.

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