महँ’गाई देश में एक बड़ा मु’द्दा रहा है लेकिन जो भी पा’र्टी स’त्ता में होती है वो इस बात से इं’कार भी करती है और इस मु’द्दे को ढँ’कने के लिए तरह-तरह के बहा’ने भी साम’ने लाती है। पर जब महँ’गाई की मा’र घर की रसोई तक पहुँच जाए तो मु’द्दा हर घर का बन जाता है क्योंकि महिलाओं का ब’जट इस महँ’गाई की च’पेट में आ जाता है, फिर भी वो कहीं से बचाकर कहीं जोड़’कर किसी तरह सब चलाती हैं। घर में रहने वाली महिलाओं के लिए इस घरे’लू बज’ट से बचा पैसा ही उनकी सम्प’त्ति है जो वक़्त- बेव’क्त उनका साथ निभा’ता है। लेकिन अब देश में महँ’गाई ने अपना पैर कुछ यूँ पसा’र लिया है कि कहीं से बच’त की कोई गुंजा’इश ही नहीं बची है।

दाल, तेल, राशन तो पहले ही महँ’गाई से हाथ मिला चुके हैं, सब्ज़ियों के दा’म भी आसमान छू’ने लगे हैं। किसी तरह जो’ड़-तो’ड़ बज’ट में किया जा रहा था कि प्याज़ ने बज’ट की कम’र ही तो’ड़कर रख दी। अधि’कांश जगहों में प्याज़ के दाम सौ के पा’र हो चुके हैं यही नहीं मुंबई, दिल्ली और कलकत्ता जैसे महान’गरों में ये क़ीम’त 150-180 तक पहुँच चु’की हैं। उस पर देश की वित्तमंत्री निश्चि’न्त हैं क्योंकि उनके घर प्याज़ खा’या ही नहीं जाता।

NIrmla Sitaraman

देश की महिलाओं का दिल तो ये सोचकर काँ’प गया होगा कि अगर वित्तमंत्री निर्मला सीतारम’ण ग़ल’ती से एक महीने की डा’इट पर चली जाएँ तो शायद एक वक़्त का खाना मिल’ना भी लोगों के लिए पर्या’प्त बता सकती हैं। जहाँ एक ओर वित्तमंत्री का ब’यान है तो वहीं दूसरी ओर सोशल मीडि’या में ऐसे लोग भी क’म नहीं हैं जो महँ’गाई को इस बात से ढँ’कने पर तु’ले हैं कि प्याज़ के बि’ना भी स्वादिष्ट सब्ज़ी बन सकती है।

इस बात से इं’कार तो नहीं किया जा सकता कि प्याज़ के बिना भी अच्छा खाना बन जाता है, जैसे ये एक तथ्य है उसी तरह का एक तथ्य ये भी है कि इंसान सि’र्फ़ पानी पर 21 दिन “आरा’म” से जी’वित रह सकता है। तो शायद अब सब्ज़ी और फल के बाद अनाज के दा’म भी आसमा’न तक पहुँच जाएँ तो प’क्ष में उत’रे लोग कह सकते हैं कि 21 दिन तो इं’सान बि’ना खाए रह सकता है बेव’जह का ह’ल्ला क्यों है?

प्रतीकात्मक तस्वीर

वहीं इस हाल’त का फ़ा’यदा उ’ठाने में व्यवसायी पी’छे नहीं हैं। जबसे प्याज़ के दा’म बढ़े हैं तब से प्याज़ को साम’ने रखकर तरह-तरह की स्की’म साम’ने आ रही हैं। कहीं हज़ार-दो हज़ार की ख़री’दी पर एक किलो प्याज़ 50 रुपए में, तो कहीं टैटू बन’वाने पर प्याज़ मुफ़्त, सभी इस स्थि’ति का फ़ा’यदा उ’ठा रहे हैं क्या मंत्री, क्या व्यवसायी, घा’टा उ’ठाने के लिए और पैसे लु’टाने के लिए ज’नता है न। एक सीधा सा सवा’ल ये है कि क्या प्याज़ के दा’म 100 का आँक’ड़ा छू’ने से पहले कुछ ऐसा था कि जिसे स’स्ता कहा जा सके? कितने दिनों से ज़रूरत की बेह’द आम चीज़ों में मेहनत की सारी क’माई फूँ’कते आम आदमी की क’मर टे’ढ़ी हो चुकी है, लेकिन संस’द, मीडि’या और सोशल मीडि’या हर जगह बेव’जह के शो’र और स्त’रही’न मज़ा’क़ से ज़्यादा कुछ नहीं हो रहा।

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