PM मोदी के खिलाफ उनके समर्थक ही उठाने लगे विरोधी स्वर, कई दिग्गज नेताओं..

केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार के 7 साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर भारतीय जनता पार्टी भले ही विभिन्न मोर्चों पर बड़े काम और पर भी उनके दावे कर रही है। लेकिन पार्टी के अंदर खाने ही भाजपा समर्थक सरकार की नीतियों और कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। साल 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के साथ पहली बार ऐसा हुआ है कि भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं ने उनके काम करने के तरीके पर सवाल उठाए हैं। इन नेताओं का कहना है कि पार्टी लाइन से जुड़े हर घर में बेचैनी और असंतोष एक पनपा हुआ है।

नाम ना बताने की शर्त पर प्रमुख राज्यों में पार्टी प्रभारी और शीर्ष नेताओं ने बताया है कि साल 2014 के बाद से यह उनके लिए अब तक का सबसे बुरा वक्त चल रहा है। पार्टी के इमानदार लोग तो उनके साथ ही हैं। पर साल 2014 के बाद पहली बार हमें अपने समर्थकों के बीच में से ही नेतृत्व क्षमता को लेकर आवाज सुनाई दे रही है जो कि बिल्कुल भी सही नहीं है।

उन्होंने आगे यह भी बताया है कि भाजपा नेतृत्व लोगों में चल रहे रोष और नाराजगी के बारे में सब जानता है। हमें आगे की रणनीति तैयार करते समय इन सब चीजों का ध्यान रखने की भी जरूरत है। हम अगर अपनी खोई हुई पूरी जमीन हासिल नहीं कर पाएंगे। तो कम से कम कुछ तो हाथ में आए यह समझा जा सकता है कि यह टिप्पणी उनके खफा वर्ग को साधने के लिए की गई है।

यहां तक कि कई नेताओं ने कहा कि सामाजिक या सार्वजनिक कठिनाई के दौरान (नोटबंदी, जीएसटी, प्रवासी मजदूर संकट आदि के बाद) पार्टी का बचाव मोदी की “ईमानदार और प्रतिबद्धता” वाली छवि के जरिए किया गया और केंद्र की योजनाओं द्वारा अच्छी साख बनाने की कोशिश की गई।

पार्टी के एक अन्य नेता और राज्यसभा सांसद ने भी बताया, “पार्टी और सरकार को बेहद सावधानी से आगे बढ़ना होगा, क्योंकि हम पर ह’मले और आलोचना का खतरा बन गया है और वह ढाल उतनी मजबूत नहीं है, जितनी कि कुछ महीने पहले थी।”इस मामले में एक केंद्रीय मंत्री का कहना है कि जब तक 3 साल और नहीं हो जाते। तब तक किसी को भाजपा या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फैसला ले करने की जरूरत नहीं है। पीएम मोदी की करिश्माई सभी और लोकप्रियता ने भाजपा को दिल्ली में बढ़त दिलाई है।

जहां पर हमने पार्टी को और मजबूत किया है। समझदार नेताओं को जब लगे कि उनके दाव काम नहीं कर रहे हैं। तो उन्हें अपनी रणनीति को बदल देना चाहिए। हम इस मामले में समीक्षा करेंगे और झटकों के साथ-साथ चोटों के बाद भी आगे बढ़ते रहेंगे।

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Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

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