“दुनिया मे जाने कितने चमन और हैं लेकिन भारत तेरे मिट्टी की महक और ही कुछ है” अस्सी के दशक में दूरदर्शन पर जब एक लोकप्रिय गीत “मिले सुर मेरा तुम्हारा” बजता था तो अनेकता में एकता का नारा अपनी बुलं’दी पर पहुंच जाता। हाल फिलहाल नफ’रतों की आवाज़ भले ही हिंदुस्तान की द’हलीज़ पर गूंज रही हो लेकिन वक़्त- वक़्त पर कुछ वाक़्यात ऐसे होते रहते हैं जो भारत की गंगा जमुनी तह’ज़ीब के बाक़ी रहने की सनद के तौर पर अपनी हा’ज़री लगाते रहते हैं।

कुछ ऐसा ही वाक़या आज पेश हुआ जब क़ालीन नगरी भदोही में जब इस लेख के लेखक के एक छोटे भाई जैसे दोस्त के बड़े पापा का इं’तेक़ा’ल हो गया। लोग उनको उनके पुश्तै’नी क़’ब्रिस्ता’न मदा’रीपुर द’फनाने बड़ी तादा’द में पहुँचे। मिट्टी देने के बाद लोग हाथ धोने के लिए पानी तला’शने लगे जो कि दूर तक नही था। ऐसे में क़’ब्रिस्तान के सामने रहने वाले विनोद कुमार श्रीवास्तव ने तुरंत अपने घर का दरवाज़ा खोल दिया और जग लेकर खुद खड़े हो गए मिट्टी देकर लौट रहे लोगों का हाथ धुलाने के लिए। विनोद कुमार श्रीवास्तव तब तक ये काम करते रहे जब तक की आखरी श’ख्स तक वहां से रु’खसत नही हो गया।

विनोद कुमार श्रीवास्तव

ये नज़ारा सब देख रहे थे। सबने विनोद कुमार श्रीवास्तव के जज़्बे की खुलकर तारीफ की। इस लेख को लिखने वाले रेहा’न हा’शमी आगे लिखते हैं कि वो उनसे गले मिले और रू’ह में त’स्कीन लिए और विनोद कुमार श्रीवास्तव के लिए ढेर सारी दुआएं अपने होंठों पर सजाए हुए मन ही मन अपने शेर को दोहराते हुए घर लौट आए। “हि’न्दू मु’स्लिम चाहत का एलान अगर कर जाएंगे/ न’फरत के सारे सौ’दागर सद’मे से म’र जा’एंगे। (इस लेख को रे हान हाशमी ने लिखा है और उन्होंने अपने अनुभवों को बयान किया है, जिसे भारत दुनिया समाज के भीतर मौजूद भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने के लिए अपने पाठकों के साथ बाँट रहा है)

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