दोस्तों मशहूर सिंगर मोहम्मद रफ़ी को कौन नही जानता है उन्होंने एक लम्बे अरसे तक फिल्म इंडस्ट्री पर राज़ किया.मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर 1924 को अमृतसर, के पास कोटला सुल्तान सिंह में हुआ था.दोस्तों एक ऐसा दौर भी था जब मोहम्मद रफी के गाये गाने हर फिल्म में होते थे.शायद ही कोई ऐसा एक्टर हो जिसके लिए उन्होंने गाने नही गाये हो.

सत्तर के दशक में मोहम्मद रफ़ी से ज्यादा किशोर कुमार की डिमांड फिल्म इंडस्ट्री में होने लगी लेकिन कई गाने ऐसे भी थे जिसे किशोर दा ने खुद ही गाने से इंकार करते हुए म्यूजिक डायरेक्टर को रफ़ी साहब से गाने का मशवरा दे दिया.

हाथी मेरे साथी का वो गाना दोस्तों आप को याद ही होगा,’नफरत की दुनिया को छोड़कर’इस गाने को किशोर कुमार ने ये कहकर इंकार कर दिया था कि ये गाना उनसे अच्छा रफ़ी साहब गायेंगे.ऐसे अनेको उदहारण है लेकिन ऐसे किस्से तो आप जानते होंगे मगर क्या आपको पता है मोहम्मद रफ़ी एक सच्चे मुस्लमान थे.वो पाबन्दी से पाचो वक़्त की नमाज़ अदा करते थे.

पैगम्बर मोहम्मद का खुद को गुलाम कहते थे-रफ़ी साहब किसी की भी गीबत नही करते थे और जो उनकी बुराई करता था उसे भी वो बहुत प्यार से पेश आते थे,रफ़ी साहब के बारे में एक बात मशहूर है जब भी उन्हें कोई रफी साहब कहता था तो वो तुरंत उसको टोक देते थे कि उनका नाम उनके घर वालो ने मोहम्मद रफी रखा है इसलिए उनके नाम में मोहम्मद लगाकर मोहम्मद रफी कहे नाकि रफी साहब.

एक इंटरव्यू में मोहम्मद रफी ने अपने नाम के बारे में कहाकि वो आशिके रसूल है और उन्हें रफी साहब की जगह मोहम्मद रफी नाम कहा जाए.अपने जमाने के दिग्गज अदाकार दिलीप कुमार का कहना है कि मोहम्मद रफ़ी अगर कोई नाम में मुहम्मद लगाना भूल जाये तो वो टोक देते थे.दोस्तों मोहम्मद रफी गरीबो की मदद करने के लिए मशहूर थे और वो कभी भी चेहरे पर गुस्सा नही लाते थे साथ ही साथ वो हसमुख थे.

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