माँ-ब’हन की गा’लियाँ देते हुए पुलिस लाइब्रेरी में घु’सी,जामि’या प्रद’र्शन को ब’दनाम करने की कोशिश नाका’म!

अभी बहुत दिन नहीं हुए जब तीस हज़ारी कोर्ट में वकीलों और पुलिस-कर्मियों के बीच भारी सं’घर्ष हो गया. इस संघर्ष में पुलिस-कर्मियों को वकीलों ने बु’री तरह पी’टा. इसके बाद पुलिस-कर्मियों के घरवाले बाहर निकले और वकीलों के ख़िला’फ़ कार्यवाई की मांग की. पुलिस-कर्मियों के घरवालों ने तब अपने बाप/भाई/बेटे/बेटी/पत्नी/माँ की सु’रक्षा की चिं’ता जताई और कहा कि किसी को क़ानून अपने हाथ में लेने का हक़ नहीं है और पुलिस वालों के साथ ब’र्बरता हुई.

जहाँ पुलिसवालों के घरवाले तब बहुत चिंति’त थे अब उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. जामिया मिलिया विश्विद्यालय में नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िला’फ़ तीन रोज़ से चले आ रहे शां’तिपूर्ण प्रदर्शन ने कल हिं’सक रूप ले लिया. अभी तक ये बात पता नहीं चल पायी है कि बसों में आ’ग पुलिस के लोगों ने लगाईं या प्रदर्शनका’रियों के किसी गुट ने. एक वीडियो ज़रूर चल रहा है जिसमें पुलिस एक कैन लेकर बस में कुछ डाल रही है.

इस वीडियो को दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी शेयर किया है वहीँ इस पर पुलिस कह रही है कि वो आ’ग लगा नहीं बुझा रही थी. सवाल मगर ये भी है कि इतनी छोटी कैन में कौन सा चमत्कारिक पानी पुलिस के लोग डाल रहे थे जिससे कि आग रुक जाए. मान भी लिया जाए कि प्रदर्शनकारी हिंस’क हो गए थे तो जब आपने उन्हें खदेड़ दिया और यूनिवर्सिटी के अन्दर चले गए तो आपको अन्दर जाने की ज़रूरत क्या थी.

लाइब्रेरी के अन्दर आँ’सू गैस के गोले छो’ड़े जाने का क्या अर्थ है. छात्रों की ज़िन्दगी को पूरी तरह से ख़’तरे में डाला गया, कई छात्रों को भारी चो’टें आयी हैं. पुलिस के लोग प’त्थर फें’कते दिख रहे हैं, आधी रात में लड़कियों के हॉस्टल में घुस’ते दिख रहे हैं, लड़कों को बु’री तरह पीट रहे हैं. जामिया और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पुलिस ने आम छात्रों के साथ जैसा सलूक़ किया है उसके बाद पुलिस के प्रति लोगों का विश्वास कम होगा.

निरंकुश पुलि’स ने काफ़ी देर तक छात्रों को नहीं छोड़ा जबकि कुछ बुरी तरह घा’यल थे. छात्रों और एक्टिविस्टों के ग्रुप ने जब दिल्ली में पुलिस हेड-क्वार्टर को घे’रना शुरू किया तो पुलिस अधिकारियों को लगा कि अब बात पूरी दुनिया देखेगी. परन्तु इन सबमें सबसे दिलचस्प यही है कि पुलिस वालों के घरवाले अब कुछ भी बो’लना नहीं चाहते. अब उनके बाप/भाई/बेटे जो भी कर रहे हैं उन्हें इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता.

About Arghwan Rabbhi

Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

View all posts by Arghwan Rabbhi →

Leave a Reply

Your email address will not be published.