लालू प्रसाद यादव के प्लान ने कई पार्टियों को चौं’काया, चुनाव बाद की…

October 4, 2020 by No Comments

पटना. बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान की तारीख़ों की घोषणा हो गई है. यहाँ दो बड़े गठबंधन चुनावी मैदान में हैं, एक तो है सत्ताधारी NDA और दूसरा है इसके ख़िलाफ़ महागठबंधन. जहाँ NDA में महज़ तीन ही पार्टियाँ मानी जा सकती हैं वहीँ महागठबंधन में कई दल हैं. महागठबंधन की जो बड़ी पार्टियाँ हैं उनमें राजद, कांग्रेस, सीपीआई(माले), सीपीएम, सीपीआई और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के नाम शामिल हैं. अब से कुछ रोज़ पहले तक हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा, रालोसपा और विकासशील इंसान पार्टी भी इस गठबंधन का हिस्सा थे.

सीटों के बँटवारे के नाम पर या किसी और वजह से हिन्दुस्तानी आवामी मोर्चा, रालोसपा और विकासशील इंसान पार्टी अलग हो गईं. असल में इन तीनों ही दलों को देखें तो ये सब बहुत ही कम क्षेत्र तक प्रभावी रहे हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह के नतीजे आये उसके बाद तो ये एक तरह से गिनती में भी नहीं आ रहे. हालाँकि चुनाव में हार-जीत होती ही है फिर इनके अप्रासंगिक होने की क्या वजह है.

जानकार इसके पीछे सबसे बड़ी वजह मानते हैं इनका समझौता करना. इन दलों की उम्र मुश्किल से 6-7 साल ही होगी और इतने में भी ये कभी इसके तो कभी उसके साथ रहे हैं. ऐसे समय में जबकि नेताओं को लेफ़्ट या राईट से पहचाना जा रहा है तो आप अगर किसी भी विचार के साथ ईमानदार नज़र नहीं आयेंगे तो आपको कोई कैसे अपने साथ रख पायेगा. कहने का अर्थ है कि इसकी कोई गारंटी तो है नहीं कि चुनाव के बाद आप किसी और दल के साथ नहीं जायेंगे. दूसरी तरफ़ जो महागठबंधन में अब पार्टियाँ बची हैं वो चाहे सीपीआई, सीपीएम हो या सीपीआई (माले) सभी की विचारधारा क्लियर है.

राजद के क़रीबी बताते हैं कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने ही तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव को ये आदेश दिया था कि इन सभी दलों से कहा जाए कि ये राजद या कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर उम्मीदवार उतारें. लालू की चिंता यही थी कि आज की सियासत के अनुरूप अगर ये बाद में अपने विधायकों को लेकर भाजपा के साथ चले गए तो महागठबंधन क्या करेगा.

जानकार मानते हैं कि राजद उतनी सीटें देने को तैयार थी जितनी इन छोटे दलों ने माँगी थीं लेकिन वो चुनाव चिन्ह अपना ही चाहती थी. दल-बदलू सियासत का पिछले कुछ सालों में सबसे ज़्यादा नुक़सान भाजपा विरोधी पार्टियों को हुआ है, पैसे और पॉवर के लोभ में विधायक और सांसद सभी पाला बदलते दिखे हैं,ऐसे में राजद या कांग्रेस का ये रवैया समझदारी का ही कहा जाएगा. कुछ लोग तो ये भी कह रहे हैं कि लोजपा ने भी महागठबंधन का रुख़ करने की कोशिश की थी लेकिन राजद और कांग्रेस ने लोजपा के लिए दरवाज़ा बंद कर लिया.

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