जो बाईडेन की बात ने सबको दिया था चौंका, रूस से जंग होने की..

रूस ने गत 24 फ़रवरी को यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया. आइये समझते हैं कि इस युद्ध की वजह क्या है और फ़िलहाल राजनीतिक तौर पर ये युद्ध कहाँ पर है. पहले समझते हैं कि आख़िर ये युद्ध हो क्यूँ रहा है. लम्बे समय से रूस और यूक्रेन के बीच कई मुद्दों पर विवाद चल रहा था. यूक्रेन नाटो का सदस्य बनना चाहता है और इसका विरोध रूस लम्बे समय से कर रहा है.

रूस की नाराज़गी यूक्रेन से इस बात को लेकर भी है कि यूक्रेन संयुक्त राज्य अमरीका का क़रीबी दोस्त है. पिछले सालों में जिस तरह से यूक्रेन की सरकार ने यूक्रेनी भाषा को आगे बढ़ाने के लिए रूसी भाषा को निशाना बनाया वो भी रूस की नाराज़गी का एक कारण है. यूक्रेन में ताज़ा क़ानून के मुताबिक़ अगर किसी को नौकरी या शिक्षा चाहिए तो उसे यूक्रेनी भाषा आना अनिवार्य है जबकि ऐसा माना जाता है कि यूक्रेन के बड़े हिस्से में रूसी भाषा प्रचलित है.

सोवियत यूनियन का हिस्सा रहे यूक्रेन की अमरीका से दोस्ती रूस को कभी रास नहीं आयी लेकिन जब यूक्रेन ने नाटो का सदस्य बनने की इच्छा ज़ाहिर की तो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कह दिया कि यूक्रेन को बनाने वाला देश सोवियत यूनियन था. पुतिन ने एक बयान में ये तक कहा कि यूक्रेन परम्परागत रूप से कभी देश नहीं रहा है. असल में यूक्रेन पहली बार देश के रूप में सन 1917 में आया लेकिन एक साल से कम समय में इस देश ने अपना वजूद खो दिया. यूक्रेन 1919 से लेकर 1991 तक सोवियत यूनियन के हिस्से में रहा, 1991 में इसे आज़ादी मिल गई और वो यूक्रेन बना जिसे आज हम जानते हैं.

चूँकि यूक्रेन सोवियत यूनियन का हिस्सा रहा था और रूस सोवियत यूनियन से निकला सबसे बड़ा देश है तो रूस यूक्रेन के कई क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहा है. पुतिन कई बार ऐसे बयान देते हैं जिससे लगता है कि वो यूक्रेन के वजूद को स्वीकार नहीं करते. रूस के पश्चिम में पड़ने वाले यूक्रेन में अपने भी कई अलगाववादी गुट हैं जिसकी वजह से यूक्रेन को एकजुटता बनाने के लिए अमरीका जैसे देशों का सहारा लेना पड़ता है.

रूस इस बात को बिल्कुल पसंद नहीं करता. अमरीका और सोवियत यूनियन के बीच लम्बे समय तक शीत युद्ध चला, इसी शीत युद्ध में नाटो की स्थापना भी हुई थी. नाटो अमरीका द्वारा बनाया गया एक सैन्य संगठन है जिसमें उसके वो सहयोगी देश शामिल हैं जिन पर अमरीका भरोसा करता है. शीत युद्ध में नाटो से मुक़ाबला करने के लिए सोवियत यूनियन और उसके सहयोगी देशों ने मिलकर ‘वॉरसॉ पैक्ट’ बनाया था. 1989 में बर्लिन की दीवार गिर गई और शीत युद्ध समाप्त हो गया.

वॉरसॉ पैक्ट के ख़त्म हो जाने और सोवियत यूनियन के विघटन के बाद ये माँग कई बार हुई कि नाटो को अब ख़त्म कर देना चाहिए, परन्तु अमरीका ने ऐसा नहीं किया. रूस आज भी नाटो को अपने दुश्मन की तरह मानता है वहीं अमरीका भी नाटो का प्रयोग अलग-अलग देशों में युद्ध लड़ने के लिए करता रहा है. यूक्रेन का नाटो की सदस्यता पाने का प्रयास करना रूस को एक चेतावनी की तरह लगा. यूक्रेन नाटो के साथ यूरोपियन यूनियन की भी सदस्यता चाहता है, हालाँकि यूरोपियन यूनियन की सदस्यता से ज़्यादा परेशानी रूस को नाटो की सदस्यता से ही है. हालाँकि यूक्रेन की नाटो का सदस्य बनने की माँग को नाटो ने ख़ुद कोई तरजीह नहीं दी.

रूसी बॉर्डर पर पड़ने वाले यूक्रेन के दो अलगाववादी क्षेत्र दोनेत्स्क और लुहांस्क रूस के साथ खड़े दिख रहे हैं और रूस इन क्षेत्रों को आज़ाद किए जाने की माँग कर रहा है जबकि यूक्रेन इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है. इन क्षेत्रों में जब यूक्रेनी सैनिकों और रूसी सैनिकों के बीच झड़पें तेज़ हुईं तो ऐसा लगा कि अब कभी भी रूस यूक्रेन पर आक्रमण कर सकता है. 24 फ़रवरी को रूसी फ़ौज ने यूक्रेन में आक्रमण कर दिया. यूक्रेन के पक्ष में अमरीका समेत अधिकतर पश्चिमी देश दिख रहे हैं, हालाँकि किसी भी देश ने यूक्रेन के लिए अपनी फ़ौज भेजने से परहेज़ किया है.

28 फ़रवरी को यूक्रेन और रूस के बीच संघर्ष ख़त्म हो इसकी कोशिशें तेज़ हो गईं. बातचीत बेलारूस में हुई, बेलारूस में यूक्रेन बातचीत करना नहीं चाहता था क्यूँकि बेलारूस रूस का क़रीबी दोस्त माना जाता है लेकिन तीन राउंड की बातचीत हुई. परन्तु कोई समझौता नहीं हो सका. 7 मार्च को रूस की ओर से इस अभियान को ख़त्म करने के लिए कुछ शर्तें बतायी गईं. रूस की शर्तें इस प्रकार थीं- यूक्रेन अन्तराष्ट्रीय मामलों पर अपनी तटस्थता बनाए, क्रीमिया रूस का हिस्सा है इस बात को स्वीकार करे, दोनेत्स्क और लुहांस्क के अलगाववादी गुटों को स्वतंत्र देश की सरकार माने.

यूक्रेनी राष्ट्रपति व्लादिमीर ज़ेलेंसकी ने इस पर कहा कि वो क्रीमिया, दोनेत्स्क और लुहंस्क को नहीं छोड़ेगा. ज़ेलेंसकी ने माँग की कि पुतिन और उनकी सीधे बातचीत होनी चाहिए. यूक्रेन की मदद के लिए और इस पूरे विवाद के लिए रूस को ज़िम्मेदार मानते हुए पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह की आर्थिक पाबंदियां लगाईं, इसके जवाब में रूस ने भी कई तरह के आर्थिक क़दम उठाए.

यूँ तो अमरीका सीधे तौर पर इस मामले में नज़र नहीं आता लेकिन रूस मानता है कि यूक्रेन उसी की शय पर काम कर रहा है. अमरीकी राष्ट्रपति जो बाईडेन ने पोलैंड में एक ऐसा बयान दिया जिससे इस लड़ाई के और बढ़ने की आशंका पैदा हो गई. उन्होंने इस ताज़ा बयान में ये तक कह दिया कि व्लादिमीर पुतिन सत्ता में नहीं रह सकते. उन्होंने कहा कि दुनिया को उदार लोकतंत्र के लिए क्रूर निरंकुश शासक नहीं चाहिए. उन्होंने यूरोप की चार दिवसीय यात्रा के दौरान कहा कि भगवान के लिए, यह आदमी सत्ता में नहीं रह सकता.

हालाँकि इसके बाद अमरीका के राष्ट्रपति कार्यालय से सफ़ाई दी गई कि जो बाईडेन के ताज़ा बयान का अर्थ ये बिल्कुल नहीं था कि वो रूस में सरकार हटाना चाहते हैं. इसके पहले भी बाईडेन कह चुके हैं कि अमरीका किसी भी सूरत में रूस पर हमला नहीं करेगा क्यूँकि ऐसा करना विश्व युद्ध का एलान होगा. दूसरी ओर आज ये भी ख़बर आयी कि ब्रिटेन रूस पर लगाई गई आर्थिक पाबंदियां हटा सकता है. यूक्रेन पर हमले के बाद ये पाबंदियां लगाई गई थीं.

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Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

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