ट्रिपल तलाक़ बिल पर भाजपा को झ’टका, सहयोगी दल ने भी कर दिया वि’रोध..

June 21, 2019 by No Comments

लोकसभा में एक बार फिर केंद्र सरकार ट्रिपल तलाक़ बिल लेकर आयी है. केंद्र सरकार चाहती है कि इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ पर बैन लगे. इसको लेकर लेकिन विपक्षी पार्टियों की राय यही है कि धार्मिक मस’अला होने की वजह से इस बिल को लाने से पहले धार्मिक नेताओं से बात करनी चाहिए थी. कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी इस बिल का विरोध किया. उन्होंने कहा कि ये बिल मुस्लिमों के ख़िलाफ़ है.

वहीँ आल इंडिया मजलिस ए इत्तिहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असद उद्दीन ओवैसी ने कहा कि इस बिल में मुस्लिमों को ही नहीं बाक़ी समुदायों को भी शामिल करना चाहिए. सपा के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान ने कहा कि उनकी पार्टी इस मुद्दे पर क़ुरान की बात मानती है. जहां विपक्ष से भाजपा को विरोध झेलना पड़ रहा है वहीँ भाजपा की सहयोगी पार्टी जदयू भी बिल के विरोध में आ गई है.

जेडीयू के प्रधान महासचिव के सी त्यागी ने कहा कि जेडीयू मौजूदा स्वरूप में तीन तलाक बिल का समर्थन नहीं करेगी.उन्होंने कहा कि हमारे दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने लॉ कमीशन को इस बारे में बताया था कि ये नाज़ुक मसला है लिहाजा इसमें सभी पक्षों से बात कर आम सहमति बनाने की करने कोशिश करनी चाहिए.उन्होंने कहा कि लेकिन इस बारे में एनडीए के भीतर कभी कोई चर्चा नहीं हुई है.

गौरतलब है कि संसदीय नियमों के मुताबिक,जो विधेयक सीधे राज्यसभा में पेश किए जाते हैं,वो लोकसभा भंग होने की स्थिति में स्वत: समाप्त नहीं होते.जो विधेयक लोकसभा में पेश किए जाते हैं और राज्यसभा में लंबित रहते हैं,वे निचले सदन यानी लोकसभा भंग होने की स्थिति में अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं.तीन तलाक बिल के साथ भी यही हुआ और यही वजह है कि मोदी सरकार को नया विधेयक लाना पड़ा.

सवाल लेकिन एक बार फिर ये उठ रहा है कि जब एक बार इस बिल के साथ लैप्ट्रिस वाली बात हो गई है तो पहले इसे राज्पयसभा में क्यूँ नहीं पेश किया गया. आपको बता दें कि तलाक पर बैन लगाने वाला विधेयक फरवरी में लोकसभा में पारित हो गया था.राज्यसभा में एनडीए सरकार के पास बहुमत नहीं था,इसलिए बिल वहां अटका रहा.अब सरकार बजट सत्र में इसे पेश करने और दोनों सदनों से पास कराने की उम्मीद कर रही है.अध्यादेश को भी कानून में तभी बदला जा सकता है जबकि संसद सत्र शुरू होने के 45 दिन के भीतर उसे पास करा लिया जाए.

इस बिल की सबसे विवादित बात विपक्ष मानता है कि इस बिल के तहत आरोपी को पुलिस ज़मानत नहीं दे सकेगी. हालांकि मजिस्ट्रेट पीड़ित पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर जमानत दे सकते हैं.उनके पास पति-पत्नी के बीच सुलह कराकर शादी बरकरार रखने का भी अधिकार होगा. इसके अलावा तलाक सिर्फ तभी संज्ञेय अपराध माना जाएगा जब पीड़ित पत्नी या उसके परिवार (मायके या ससुराल) के सदस्य एफआईआर दर्ज कराएंगे.

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