संघर्षों को झेल कर गद्दी पर फिर से क़ाबिज़ हुआ था हुमायूँ

May 31, 2018 by No Comments

नासिर उद्दीन मुहम्मद हुमायूँ मुग़ल साम्राज्य के दूसरे बादशाह थे. उन्होंने अपने पिता बाबर की मौ-त के बाद मुग़ल साम्राज्य की गद्दी संभाली थी. हुमायूँ का जन्म 17 मार्च, 1508 को हुआ. हुमायूँ 1530 से लेकर के 1540 तक बादशाह रहे लेकिन इसी समय शेर शाह सूरी ने मुग़लों से मुक़ाबला करने की ठान ली थी. सूरी ने 1540 में हुमायूँ को शिकस्त दी और सूरी साम्राज्य की स्थापना की. उसके बाद शेर शाह सूरी ने हुमायूँ को हराकर सूरी साम्राज्य की स्थापना की.

हुमायूँ ने कई जगह उल्लेख किया है कि मुग़ल सेना की हार के बाद जब उन्हें देश छोड़ना पड़ा तो वो उनके लिए सबसे मुश्किल दौर था. भीषण गर्मी के समय उन्हें थार के रेगिस्तान से गुज़रना पड़ा. उन्होंने इस दौरान ईरान में शरण ली. सन 1545 में शेर शाह सूरी की मौ-त हो गयी. सूरी के बेटे इस्लाम शाह की मौ-त 1554 में हुई. इसके बाद सूरी साम्राज्य बिखरने लगा. हुमायूँ ने इस मौके को समझा और एकबार फिर हारी बाज़ी जीतने की सोची. 1555 में एक बार फिर हुमायूँ ने मुग़ल साम्राज्य का झंडा भारत पर फहराया.27 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मौ-त हो गयी. वो अपनी लाइब्रेरी की सीढ़ियों से गिर पड़े. वो जब गिरे तब अज़ान हो रही थी. गिरते वक़्त उनके हाथ किताबों से भरे थे.

हुमायूँ के बारे में एडवर्ड एस होलडेन लिखते हैं कि वो बहुत दयालु थे और अपने बेटे, अपने दोस्तों और अपने साथियों को बहुत चाहते थे. वो आगे कहते हैं कि उनके करैक्टर की इसी कमी की वजह से वो बहुत कामयाब शासक ना हुए लेकिन ये एक ऐसी कमी है कि हुमायूँ बतौर इंसान हमें और अच्छे लगते हैं. अपनी कूटनीति के लिए हुमायूँ को इंसान-ए-कामिल कहा जाता था. हुमायूँ की जीवनी का नाम हुमायूँनामा है जो उनकी बहन गुलबदन बेग़म ने लिखी है. इसमें हुमायूँ को काफी विनम्र स्वभाव का बताया गया है और इस जीवनी के तरीके से उन्होंने हुमायूँ को क्रोधित और उकसाने की कोशिश भी की है.

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