हम इतिहास को उन्हीं नज़रों से देखते हैं, जैसे हम हैं…

एदुअर्दो गलेअनो के अनुसार ‘इतिहास कभी अलविदा नहीं कहता, वह कहता है कि फिर मिलेंगे’ पर बदलते समय के जिन-जिन नये मोड़ पर वह मिलता है, वह टकरा जाता है. इतिहास की विवेचना, व्यक्ति की समझ को प्रतिबिंबित करती है. बात कही जाती है कि जो हो गया सो हो गया अब आगे बढो पर फिर हमे शर्म, घमंड, ग़ुस्सा आदि क्यों महसूस होता है. उत्खनन में मिली तलवार कभी हत्यारी हो जाती है तो कभी रक्षक, अब इतिहास का पुनर्निर्माण नहीं हो सकता, ऐसे में उसकी नयी विवेचना का कारण दिया जाता है ‘सही सच्चाई’ को उजागर करने के लिए. नियति का खेल निराला होता है कि सच्चाई को भी सही होना पड़ता है.

पर यह सिर्फ धर्म, राजा, वीरता, साम्राज्य तक सीमित नहीं…सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर ओडिशा सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की… और मुद्दा था रसगुल्ला की जन्मभूमि, बंगाल या ओडिशा, हाँ इसके लिए कोई आन्दोलन नहीं चला, न ही कोई रथ निकला, और कोई इमारत भी नहीं गिरायी गयी. रसगुल्ले पर हक़ तो सिर्फ ज़बान का है.
हम इतिहास को उन्ही नजरों से देखते है, जैसे हम है. हमारा इतिहास कभी वर्तमान था, पर तात्कालिक था और जिसका था अब वो भी नही रहे, पर हमारा सीना भारी होने लगता है अगर हमे ‘सुनने में’ अच्छा न लगे.

(ये लेख वैभव मिश्रा ने लिखा है, वैभव लखनऊ विश्विद्यालय से अन्थ्रोपोलोजी की पढ़ाई कर रहे हैं)

फ़ीचर्ड इमेज: जक्क़ुएस लुइस डेविड की पेंटिंग दा कोरोनेशन ऑफ़ नेपोलियन (1806-1807)

नोट- भारत दुनिया की ये नयी सीरीज़ है इसमें हम इतिहास से जुड़ी बातों पर चर्चा करेंगे. इस सीरीज़ में अगर आप कोई लेख हमारे पास भेजना चाहते हैं तो arghwanbharat@gmail.com पर भेज सकते हैं. किसी तरह की शिकायत या आलोचना भी आप इस मेल पर भेज सकते हैं.

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