पश्चिम बंगाल की जाधवरपुर यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर अब्दुल मतीन कहते हैं कि भारत में घर वापसी का जो नारा दिया गया, वह सामाजिक और सियासी रूप से धोखा है प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ”घर वापसी का नारा दे रहे हैं लेकिन किस घर में? घर की बालकनी में रहना है या आहाते में या फिर गैराज में रहना है मुझे तो लगता है कि घर की बेल बजाने पर कोई दरवाज़ा भी नहीं खोलेगा।

उन्होंने कहा हिन्दू धर्म में जाति का जो चेन है, उसे तोड़ना आसान नहीं है इसे आंबेडकर नहीं तोड़ पाए और हारकर वह बौद्ध बन गए. जो अब्राहमिक मज़हब हैं यानी इस्लाम और ईसाई की बात करें तो वहाँ सेंस ऑफ कलेक्टिविटी है. सेंस ऑफ बिलॉन्गिंग है. यानी आप भी उस समूह का हिस्सा हैं और जुड़ाव महसूस करते हैं. लोग हिन्दू धर्म में चले तो जाते हैं लेकिन सामाजिक मान्यता नहीं मिलती।

प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ”जो लोग हिन्दू बन रहे हैं वो हृदय परिवर्तन होने के कारण नहीं बन रहे हैं. ये धर्मांतरण राजनीति से प्रेरित हैं. लेकिन अगर कोई मुसलमान हृदय परिवर्तन से भी हिन्दू बन रहा है तो क्या हिन्दू समाज का हृदय परिवर्तन होगा? यानी हिन्दू समाज इतना उदार बनेगा कि उन्हें स्वीकार कर ले?

सुखबीर सिंह कहते हैं, ”देखो जी, हिन्दू से मुसलमान बनना आसान है लेकिन मुसलमान से हिन्दू बनना मुश्किल है. हिन्दू समाज में जाति अब भी बहुत अहमियत रखती है. अब भी शादी विवाह अपनी जातियों के भीतर ही होती है कोई मुसलमान से हिन्दू बनेगा तो उसे कौन जाति अपनाएगी?

ये वही सुखबीर सिंह है जिन्होंने बागपत में मुस्लिम से हिन्दू होने वाले परिवार को रहने के लिए अपना घर दिया था वो आगे कहते हैं जाति तो जन्मजात होती है. पसंद के आधार पर मिलती नहीं है. मान लो ये हमारी जाति जाट में आना चाहें, लेकिन इन्हें कौन जाट अपना लेगा?

 

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