आज भू’ल से भी देख लिया चाँ’द तो पढ़ें ये कहानी, वरना लग सकता है चोरी का इल्ज़ा’म

आज गणेश चतुर्थी है, वैसे तो हर गणेश चौथ में चाँद का बहुत महत्व होता है लेकिन आज के दिन जो भी चाँद देख ले उस पर बेव’जह के आरो’प लग सकते हैं। ऐसा ही आरो’प एक बार श्रीकृष्ण पर भी लगा था, कहा जाता है कि अगर किसी ने आज चाँद को भू’ल से देख लिया हो तो वो अगर श्रीकृष्ण की इस कथा को पढ़ता है तो उसके सारे दो’ष मिट जाते हैं। आइए हम आज आपको बताएँ श्रीकृष्ण की ये कथा।

जब श्रीकृष्ण द्वारिकापुरी में निवास करते थे तब वहाँ सत्राजीत नामक एक बड़ा ध’नी व्यक्ति भी रहता था। सत्राजीत ने भगवान सूर्य की उपा’सना करके उनसे स्यमन्तक नाम की मणि प्राप्त की। उस मणि का प्रकाश भगवान सूर्य के समान ही था। उस मणि से हर रोज़ सत्राजीत को आठ भार सो’ना मिलता था। एक दिन श्रीकृष्ण अपने साथियों के साथ बैठे थे कि तभी सत्राजित उस मणि को पहनकर उनके पास आए, उनका ऐसा रूप देखकर लोगों ने कहा कि इस अलौ’किक मणि को रखने का ह’क़ तो राजा का होता है इसलिए तुम ये मणि राजा उग्रसेन को दे दो। ये बात सुनकर सत्राजीत बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया। घर पहुँचकर उसने वो मणि अपने देवस्थान में स्था’पित कर दी।

श्रीकृष्ण

कुछ समय के बाद सत्राजीत का भाई प्रसेनजीत उस मणि को पहनकर जं’गल शि’कार करने गया और वहाँ शे’र ने मणि का प्र
काश देखकर प्रसेनजीत और उसके घोड़े को मा’र डाला। जब मणि गिरी तो उस मणि को शे’र ने अपने पास रख लिया। बाद में उस सिंह को ऋ’क्षराज जाम्बवंत ने मा’र दिया और मणि को लेकर अपनी गुफ़ा में चला गया। उस मणि को अपने बच्चे को खेलने के लिए थमा दिया। इधर द्वारका में जब प्रसेनजीत नहीं लौ’टा तो भाई सत्राजीत को लगा कि मणि के लाल’च में श्रीकृष्ण ने उसके भाई का व’ध कर दिया है और मणि अपने पास रख ली है। बस उसने ये बात कहनी शुरू की और धीरे-धीरे पूरी द्वारका में कृष्ण पर चो’री का संदेह होने की बात फैल गयी।

श्रीकृष्ण को ख़ुद पर लगे इस कलं’क का पता चला तो उन्होंने सोचा कि कुछ भी हो ख़ुद पर से ये आरो’प मि’टाना आवश्यक है। बस उन्होंने मणि को वापस ढूँ’ढ लाने के लिए वन जाने का निर्णय किया। वन में पहुँचते ही उन्होंने देखा कि प्रसेनजीत और उसका घोड़ा म’रा पड़ा है लेकिन मणि आसपास है ही नहीं। आगे जाने पर उन्हें एक सिंह म’रा हुआ नज़र आया। आगे एक रीछ के पैरों के निशान देख श्रीकृष्ण आगे बढ़े एक गु’फ़ा नज़र आयी तो श्रीकृष्ण उसमें गए जबकि साथ आगे लोगों को वहीं रूकने के लिए कहा।

श्रीकृष्ण- जाम्बवंत कथा

वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि उस प्रकाशवान मणि को रीछ का एक बालक लिए हुए खेल रहा है। श्री कृष्ण ने उस मणि को वहाँ से उठा लिया। यह देख कर जाम्बवन्त अत्यन्त क्रो’धित होकर श्री कृष्ण को मा’रने के लिये झप’टा। जाम्बवन्त और श्री कृष्ण में भ’यंकर यु’द्ध होने लगा, जब श्रीकृष्ण बारह दिनों तक बाहर नहीं आए तो लोगों ने सोचा कि अब वो नहीं रहे और वापस द्वारिकापुरी लौटकर सभी ने महाराज उग्रसेन से ये बात कह दी।

दूसरी ओर अट्ठाईस दिन यु’द्ध के पश्चात भी जब श्रीकृष्ण ल’ड़ते ही रहे तो जाम्बवंत ने व्या’कुल हो उठा और उसे समझ आ गया कि श्रीकृष्ण वही अवता’र हैं जिनका वो अब तक इंतज़ार कर रहा था। आख़ि’र जाम्बवंत ने श्रीकृष्ण से कहा कि वो यु’द्ध नहीं करना चाहता। ऐसे में जब श्रीकृष्ण ने उससे स्य’मन्तक मणि वापस माँगी ताकि वो स्वयं पर लगा आरो’प झू’ठा साबि’त कर सकें, तो जाम्बवंत ने उनके सामने श’र्त रखी कि अगर श्रीकृष्ण उसकी बेटी जाम्बवंती से विवाह करते हैं तभी वो उन्हें भेंट स्वरूप मणि देगा। इस तरह जाम्बवंती से विवाह करके श्रीकृष्ण मणि लेकर वापस आए और उन्होंने वो मणि सत्राजीत को सौंप दी।

श्रीकृष्ण द्वारा चंद्रदर्शन( प्रतीकात्मक तस्वीर)

श्रीकृष्ण पर आरो’प लगाने के कारण सत्राजीत को बहुत लज्जा महसूस हुई और उन्होंने अपनी कन्या सत्यभामा से श्रीकृष्ण का विवाह करवा दिया और उपहारस्वरूप वो मणि श्रीकृष्ण को देना चाहा लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें मणि लौटा दी। बाद में जब नारद जी से श्रीकृष्ण ने इस कलं’क लगने का कार’ण जानना चाहा तो नारद जी ने उन्हें बताया कि उन्होंने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चंद्रमा को देखा था इसी कारण उन्हें ये लांछ’न झेलना पड़ा।

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Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

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