ठंड के मौसम में दुकानों पे अपने चटक रंग से आकर्षित करने वाला और शाम को घर में, अपनों की महफिल में या तनहा ही सही पर इस गर्म-मीठा-चित्ताकर्षक गाजरकाहलवा हमारे दिलों को खूब भाता है। पर एतिहासिक तौर पर हलवा, और गाजर भारत के नहीं हैं बल्कि इनका नाम भी विदेशी ही लोगों का दिया हा है. बात अगर करें कि कौन सा शब्द कहाँ से आया है तो हलवा शब्द मूल रूप से अरबी है और मिठाई भी मूल रुप से अरबी ही है जिसका अरबी में अर्थ मीठा होता है और ये शब्द व इसे बनाने की विधि अरब व्यापारियों व शाशकों द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग एक हजार साल पहले पहुँची हालांकी गाजर अभी भी नहीं आया था।

गाजर लगभग 400 से 500 साल पहले पूर्तगालियों द्वारा इस महादवीप पर लाया गया, गौर करने वाली बात यहाँ ये भी है की प्रकृतिक तौर पे गाजर नारंगी या लाल रंग का नहीं होता था, यूरोप के डचवासियों ने 17वीं सदी में पीले और बैगनी गाजरों में परागन करा, इन्हे उत्पन्न किया। इसका उत्पादन विलियम ऑफ ऑरेंज के समर्थन से भी जोड़ा जाता है ज़िन्होने 16वीं सदी में स्पेन के राजशाही का विरोध किया था। 15वीं सदी की शुरूवात में लाल या नारंगी गाजर इस महाद्वीप में पहुँचा और मुगलकाल में मुगल रसोईयों ने इसका इजाद किया था, फिर क्या इसका चस्का ऐसा लगा की ये आज भी हमारी मन को लल्चा जाता है। समाज इसी तरह से विकसित हुआ है. हम आज बहुत सी ऐसी चीज़ें इस्तेमाल करते हैं जो हमें लगती हैं कि भारत में ही जन्मी हैं लेकिन इन मिठाइयों के साथ तो ये बात सही नहीं साबित होती.

(वैभव मिश्रा)

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