लन्दन/अंकारा: तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन को एक और कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है. लन्दन में हुई नाटो की शिखर वार्ता में कई अहम् मुद्दों पर चर्चा हुई. इनमें सबसे संवेदनशील वो मुद्दे थे जो तुर्की से जुड़े हुए थे. कुछ ऐसे भी नेता नाटो में हैं जो तुर्की विरोधी हैं और चाहते हैं कि तुर्की को इस संगठन से बाहर किया जाए लेकिन उनकी कोई बात नहीं चली और एर्दोआन ने एक बार फिर अपनी कूटनीति से साबित किया कि तुर्की अपनी नीतियों से पीछे हटने वाला नहीं है.

नाटो की इस शिखर वार्ता के शुरू में फ़्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मक्रों के एक बयान की भी चर्चा हुई. उन्होंने नाटो को ‘ब्रेन-डेड’ बता दिया. मक्रों के बयान के बाद नाटो में एक तरह की नीरसता भी देखी गई लेकिन नाटो के सेक्रेटरी जनरल जेन्स स्तोल्तेंबेर्ग ने इस मामले को ठीक से हैंडल किया और शिखर वार्ता के ख़त्म होते होते उन्होंने नाटो में फिर से उत्साह भर दिया.

नाटो शिखर वार्ता में इस बार जो अहम् डिक्लेरेशन हुआ वो है कि नाटो ने सीरिया के उन सभी चरमपंथी गुटों को आतंकी माना है जिनको तुर्की पहले से आतंकी मानता है. ये तुर्की के लिए बड़ी कामयाबी माना जा सकता है. तुर्की पहले से ही कहता रहा है कि YPG को आतंकी संगठन माना जाए लेकिन अमरीका जैसे देश YPG से सहयोग लेते रहे हैं. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भी माना कि तुर्की की चिन्ताएं जायज़ हैं और उसको उसकी सीमा पर आतंकी गुटों से उसे ख़तरा है.

इसके बदले में तुर्की ने भी बाल्टिक डिफेंस प्लान को मान लिया है. इसको लेकर पहले तुर्की ने आपत्ति जताई थी. देखा जाए तो नाटो के लिए ये कामयाबी की बात है. तुर्की भी अपनी कूटनीति में कामयाब रहा. तुर्की ने रूस के साथ अपने संबंधों पर भी कहा कि तुर्की ने नाटो के लिए महत्वपूर्ण सहयोग किया है जो वो आगे भी करता रहेगा और रूस से संबंधों का बेहतर होने का मतलब ये नहीं कि नाटो से वो दूर जा रहा है.

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