एक सीट पर सिमटने वाली बसपा ने बदली रणनीति, अब ‘सर्वजन हिताय..’ नहीं बल्कि..

बहुजन समाज पार्टी जब बनी थी तो इस पार्टी का नारा था “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय”। दलित समुदाय को ध्यान में रखकर इस पार्टी को कांशीराम ने बनाया था। बाद में इसकी कमान मायावती के हाथ में आयी। बसपा ने शुरुआती राजनीति में पूरा फ़ोकस दलित वोट्स पर किया और जब मायावती सरकार में आईं तो उन्होंने दलित चिंतकों की मूर्तियाँ भी लगवाईं और दलितों के लिए कई योजनाएँ भी शुरू कीं।


ऐसा माना जाता है कि बसपा में बड़ा बदलाव तब आया जब कांशीराम की मौत हो गई। कांशीराम की मौत के बाद जब मायावती ने पार्टी को पूरी तरह अपने कंट्रोल में लिया। हालाँकि बहनजी के नाम से विख्यात नेत्री को सलाहकारों की ज़रूरत थी। ऐसे समय में ‘बहन जी’ को सतीश चंद्र मिश्रा और नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी नज़र आए। हालांकि अहम फ़ैसलों में मायावती सतीश मिश्रा की ही राय पसंद करती थीं।

2007 के चुनाव से पहले बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग की बात कही और अपना नारा ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ से ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ कर लिया। 2007 के चुनाव में बसपा की सारी रणनीति हिट रही और बसपा ने बहुमत से सरकार बनाई।


मायावती एक बार फिर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन गईं। पाँच साल के इस कार्यकाल में मायावती को किसी सहयोगी दल से कुछ नहीं पूछना था क्यूँकि उनके पास बहुमत था। परंतु सरकार बनने के बाद मायावती के कोर सपोर्टर ग्रुप में एक भावना आने लगी। कुछ लोगों को लगने लगा कि मायावती अपनी सोशल इंजीनियरिंग के चक्कर में दलित समुदाय को भूल रही हैं।

मायावती का वोट उनसे खिसकने लगा। जो नया जुड़ा था वो तो 2012 में सपा लहर देखकर उधर चलेया गया वहीं जो पुराना था वो पार्टी में ख़ुद को अलग-थलग महसूस करने लगा।

2012 में सोशल इंजीनियरिंग की थ्योरी पिट गई, 2014 लोकसभा चुनाव में और बुरा हाल हुआ। 2017 में बसपा की परफॉरमेंस ऐसी रही कि ख़ुद मायावती को भरोसा नहीं हुआ। उन्होंने बसपा की हार का जिम्मेदार EVM को बताया। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले सपा से गठबंधन किया और 10 सीटें जीतीं। लोकसभा चुनाव के बाद मायावती ने सपा से गठबंधन तोड़ दिया और 2022 चुनाव से पहले फिर सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर फोकस किया।



असल में बसपा के लिए सोशल इंजीनियरिंग का अर्थ दलितों के साथ ब्राह्मण और मुस्लिम को लाना था। भाजपा के अच्छे दौर की वापसी के बाद ब्राह्मण बड़ी संख्या में भाजपा में चला गया और जो मुसलमान बसपा से जुड़ा था वो भी बसपा नेतृत्व की उदासीनता से नाराज़ होकर सपा में चला गया।

2022 विधानसभा चुनाव से पहले बसपा के कई बड़े दलित नेता भी सपा में शामिल हो गए। पार्टी ने प्रचार भी ऐसे किया कि किसी को समझ ही नहीं आया कि बसपा सीरियस भी है या नहीं। सोशल मीडिया के इस दौर में बसपा की फ़ेसबुक जैसी वेबसाइट्स पर प्रेज़ेन्स न के बराबर है। मीडिया में ऐसी भी बातें आयीं कि बसपा का भाजपा से अंदरूनी गठबंधन है। भले मायावती और सतीश चंद्र मिश्रा इस बात को अफ़वाह कहते रहे लेकिन चुनाव में ये बात लगभग हर ज़िले में चली।

2022 विधानसभा चुनाव में बसपा को महज़ एक सीट मिली और 12% वोट मिला, इनमें अधिकतर वोट दलित समाज का ही है। ऐसे में बसपा अब ‘सर्वजन’ का नारा त्यागकर ‘बहुजन’ के नारे की ओर जाने की बात कर रही है। पार्टी के बड़े नेता मानते हैं कि बसपा की ये बड़ी ग़लती रही कि उसने अपनी विचारधारा का त्याग कर दिया था, अब पार्टी को अगर अच्छा करना है तो अपने पुराने वोटर्स के पास लौटना होगा।

आंदोलन की राजनीति से दूर जा चुकी बहुजन समाज पार्टी अपने पुराने कलेवर में आ पाएगी या नहीं ये तो कहना मुश्किल है लेकिन इस चुनाव की हार ने बसपा के अंदर ख़लबली मचा दी है।


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Arghwan Rabbhi is a researcher and journalist.

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