पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी को लगे झटके से अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह उभर नहीं पाए थे कि राज्य से अब भाजपा को एक और बड़ा झटका लग गया है।

खबर के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के कई नेता तृणमूल कांग्रेस में वापस जाने की तैयारी करने लगे हैं जो कि विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। बताया जाता है कि कई नेता भाजपा से इस्तीफा दे चुके हैं और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के संपर्क में आ गए हैं।

इसी बीच पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चा के उपाध्यक्ष कासिम अली ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष को अपना इस्तीफा भी भेज दिया है एक वक्त था। जब कासिम अली को मुकुल रॉय का करीबी माना जाता था। विधानसभा चुनाव से पहले शुभेंदु अधिकारी के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए कविरुल इस्लाम ने भी यही दावा किया है। वह पहले तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। अब उन्होंने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है।

तृणमूल प्रवक्ता कुणाल घोष के अनुसार, “वे दोनों मेरे पास आए थे। लेकिन मैं कुछ नहीं कह सकता। और अनेक लोग आना चाहते हैं। वे विभिन्न तरीकों से संपर्क बना रहे हैं। कुछ तो यह कहकर रोना-धोना कर रहे हैं कि उनसे गलती हो गई। घोष के अनुसार पार्टी ने अभी तक उन लोगों पर फैसला नहीं किया है जो चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे।

तृणमूल में वापसी को लेकर काशिम और कविरुल का एक ही बयान है। 2016 में गेरुआ खेमे में शामिल हुए काशिम ने कहा, ”भाजपा में अल्पसंख्यकों के लिए काम करना संभव नहीं है। मैं अकेला नहीं हूं, मुस्लिम समुदाय के कई लोगों ने मुझसे तृणमूल से जुड़ने के लिए संपर्क किया है।

मुझे उम्मीद है कि हमें माफ कर दिया जाएगा और वापस ले लिया जाएगा।” इसी तरह, कविरुल ने कहा, “भाजपा में शामिल होने के बाद, मुझे काम में ही नहीं लगाया गया। और जिस तरह से बीजेपी ने फिरहाद हाकिम, सुब्रत मुखर्जी, मदन मित्रा को सीबीआई से गिरफ्तार करवाया है, वह गलत है।”

इतना ही नहीं बीते साल दिसंबर में भारतीय जनता में शामिल हुए पुरसुरा से तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक शेख परवेज रहमान ने भी भारतीय जनता पार्टी को छोड़ने की बात कह दी है। इनमें सबसे पहले काशिम भाजपा में शामिल हुए थे। इसलिए भाजपा को डर है कि वे कई अल्पसंख्यक नेताओं को अपने साथ लेकर जा सकते हैं। हालांकि राज्य नेतृत्व इस बात को खुलकर स्वीकार नहीं कर रहा है।

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