अपनी ही सीट का माहौल समझने में क्यूँ चूक गए राहुल गांधी?

लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर जीत का पताका फहराया। विपक्ष की सारी रणनीति नाकाम साबित हुई। लेकिन इस बीच जिस एक सीट पर सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है वह है अमेठी की। यहाँ से राहुल गांधी का हारना न सिर्फ कांग्रेस के लिए बुरे संकेत हैं बल्कि खुद राहुल गांधी के मनोबल के लिए अच्छा नहीं है। एक और तो वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे, वहीं दूसरी और वह अपनी सीट भी नहीं बचा पाये।उनके आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया है कि जनता ने उनको नाकार दिया है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के नेता और रणनीतिकार इस स्थिति को पहले से भांप नहीं पाये थे। एक तरफ बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह हैं जो नतीजों और एक्ज़िट पोल से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में 300 सीट पर जीत का दावा करते हैं और जीत भी जाते हैं।वहीं दूसरी और कांग्रेस की ये परम्परागत सीट थी जहाँ भाजपा को कामयाबी मिली है, वह अमेठी में हवाऔं के रुख को पढ़ नहीं पायी।

राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं।वह कांग्रेस की एक विचार धारा को लेकर चुनावी मैदान में उतरे थे। उन्हें पूरे देश की जनता को साथ लेकर चलना था।ऐसे मे कांग्रेस की उत्तर प्रदेश इकाई और खास तौर पर अमेठी के कार्यकर्ताओं की ज़िम्मेदारी काफ़ी बढ़ जाती थी। सवाल उठता है कि अगर उनको पहले से अंदाज़ा था तो जिस तरह की बड़े नेताओं की रैलियां और जनसंपर्क होना चाहिए था वह क्यों नहीं हुआ ।प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में ही थी।उन्हें भी इसे नाक का सवाल बना लेना चाहिए था।

अब क्योंकि कांग्रेस चुनाव हार चुकी है और राहुल गांधी अपनी सीट नहीं बचा पाये हैं तो उनके विरोधी तो उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठायेंगे ही,जिसके जवाब देना कांग्रेस समर्थकों को काफी मुश्किल पड़ेगा। विरोधी तो कहेंगे ही जब आप अपने लोकसभा क्षेत्र मे अपनी बात नहीं समझा पाये तो बाकी़ देश में कैसे पहुचायेंगे।

(नूर उज़ ज़मां)

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