तहज़ीब और अदब की पाठशाला थे तवायफ़ों के कोठे

June 5, 2018 by No Comments

अगर कोई आपसे ये कहे की कोठे कभी पाठशाला हुआ करते थे जहाँ तहजीब और अदब सीखी जाती थी और तवायफें हुनर पेश करती थी जिस्म नहीं. मोरन सरकार उन्ही में एक है जिनकी शादी महाराजा रंजित सिंह से हुई और इनके नाम पर सिक्के भी जारी करवाये.गौहर खान के गायन को कौन भूल सकता है उनकी शास्त्रीय गायन में निपुणता आज भी सुनने वालों के मन को भा जाती है.सिर्फ ये ही नहीं ऐसे कई नाम है जिन्हें आप रोज सुनते है जो तावायेफें थे जिनका योगदान १८५७ की क्रांति में है, सामाजिक सुधार आन्दोलनों में रहा है, स्वंत्रता आन्दोलन में रहा है और आज़ादी के बाद भी उनका अहम योगदान रहा है जिसके लिए उन्हें पद्म पुर्रुश्कार भी मिल चुके है पर उनका नाम एक तवायफ के तौर पर सुनना, एक हीनता ही है क्योंकि अंग्रेजी हुकुमत ने हमारे मानस में मूढ़ता और संकीर्णता के ऐसे बीज बोये है जिनकी जड़ें बहुत गहरी हैं.

मुग़ल काल में मिले राजकीय आश्रय से इनकी सामाजिक स्थिति में वृद्धि होती है. ये शास्त्रीय गान और नृत्य में निपुण हुआ करती थी जिन्हें शाही दरबार में मनोरंजन के लिए शायरी, नाच –गान का प्रदर्शन करती. मुग़ल सल्तनत के कम्जूर होने के बाद इस कला को अवध के नवाबों ने आश्रय दिया. अवध के नवाब, राजकुमार, ऊँचे घरानों के लड़कों को यह अदब, धीरज की तालीम के लिए यहाँ भेजा जाता था. इस कला को कलंकित करने का काम ब्रितानी काल में हुआ जब अंग्रेजी अफसरों ने इन्हें अपनी हवस मिटने का जरिया समझा, और गुलाम के साथ किया गया हर कर्म वैध होता है ! और 1857 की क्रांति में मदद करने के कारन अंग्रेजों ने अपना प्रतिशोध इनके जिस्म से लिया.

७०-80 के दशक तक की पिक्चरों में इनका किरदार बहुत मजबूत होता, ये किरदार न सिर्फ औरत की मजबूरी को बल्कि औरत की व्यथा को भी बयाँ करती.एक फिल्म में एक तवायफ जब शादी के कपड़े पहें महफ़िल में आती है तो सब उसकी ख़ूबसूरती को निहारने लगते है पर तभी महफिल से एक आदमी कहता है की ये तम्हारे किस काम के, एक दूसरी फिल्म है “उमराव जान”. वीणा तलवार अपनी किताब “दा मेकिंग ऑफ़ कोलोनियल लखनऊ” में कहती हैं कि तवायफ़ों को वैश्या बताना बहुत ही ग़लत वर्णन है.

(वैभव मिश्रा)

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