आज कल के दौर में अगर देखा जाए तो अधिकतर अरब नेता ऐसे हैं जो संयुक्त राज्य अमरीका के इशारे पर ही काम करते हैं. इनसे अलग जो अरब नेता हैं वो रूस जैसी शक्तियों के साथ खड़े रहते हैं और कोई मज़बूत फ़ैसला ख़ुद से नहीं कर पाते. लेकिन हमेशा ये दौर नहीं था, एक ऐसा दौर भी था जब अरब नेता मज़बूती से अपनी बात विश्व के सामने रखते थे और इस का सबसे सुनहरा दौर तब आया था जब गमाल अब्दुल नासिर नाम का शासक मिस्र की राजनीति के शिखर पर पहुंचा.

नासिर का जन्म 15 जानवर, 1918 को हुआ था. वो मिस्र के दूसरे राष्ट्रपति बने. उनका कार्यकाल मिस्र में तरक्क़ी का वक़्त था. लेकिन वो देश में ही नहीं विदेश में भी अच्छी ख़ासी पॉपुलैरिटी रखते थे. उनके चाहने वाले हर अरब देश में थे. उनकी पॉपुलैरिटी को नया आयाम मिला स्वेज़ नहर संकट(1956) से. स्वेज़ नहर संकट में जिस तरह से उन्होंने कूटनीति का सहारा लिया उसका लोहा पूरी दुनिया ने माना. स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी कि ब्रिटेन जैसी सुपर पॉवर को अपनी फ़ौजों को वापिस बुलाना पड़ा और साथ ही सुपर पॉवर का तमगा भी खो देना पड़ा. नासिर की कूटनीति ने उनकी पहचान पूरी दुनिया में करा दी. उन्होंने जवाहर लाल नेहरु और जोसिप बरोज़ टीटो के साथ मिलकर NAM के फार्मेशन में अहम् भूमिका अदा की.

वो एकमात्र ऐसे नेता माने जा सकते हैं जिन्होंने दो देशों को मिलाकर एक रिपब्लिक बनाने की कामयाब कोशिश की. यूनाइटेड अरब रिपब्लिक नाम का ये देश 1958 में बना, इसमें मिस्र के अलावा सीरिया,और आल पलेस्टाइन प्रोटेक्टोरेट शामिल थे. हालाँकि 1961 में मतभेदों के चलते इसे निरस्त करना पड़ा. हालाँकि 1967 के युद्ध में उन्हें इज़राइल से हार का सामना करना पड़ा लेकिन उनकी पॉपुलैरिटी कभी कम नहीं हुई. उनका देहांत 28 सितम्बर, 1970 को हुआ. आज भी पूरे अरब समाज में उनका बहुत सम्मान किया जाता है.

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