उत्तर प्रदेश की सत्ता पर एक समय राज करने वाली बहुजन समाज पार्टी पूरी तरह से सिमट गई है. मायावती के नेतृत्व वाली इस पार्टी ने दो और नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया है. दोनों ही बसपा के जूझारू नेता था. लालजी वर्मा न सिर्फ विधानमंडल दल के नेता थे बल्कि वर्मा वह नेता हैं जिनके प्रदेश अध्यक्ष रहते 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार यूपी में बनी थी तो राम अचल राजभर भी मायावती के खासम खास माने जाते रहे.

सवाल ये भी उठता है कि इन बड़े नेताओं को पार्टी से निकालकर बसपा आगे क्या प्लान बना रही है. चुनाव में अब एक साल से भी कम समय बचा है. बसपा से निष्कासित विधायक असलम राईनी कहते हैं कि इन 10 सालों में बसपा 206 विधायकों से महज 7 विधायकों पर आ टिकी है. यह सच बात है. बसपा के जिन नेताओं को प्रदेश स्तर पर पहचान हासिल हुई थी वह एक-एक करके बसपा से अलग हो गए हैं. 2007 में जब प्रदेश में बसपा की बहुमत की सरकार बनी थी तब मायावती ने जितने विधायकों को कैबिनेट मंत्री बनाया था उनमें से आज एक्का-दुक्का ही बसपा के साथ खड़ा है.

2007 विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करके बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. मायावती ने नकुल दुबे, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा, रामवीर उपाध्याय, ठाकुर जयवीर सिंह, सुधीर गोयल, स्वामी प्रसाद मौर्य, वेदराम भाटी, चौधरी लक्ष्मी नारायण, राकेश धर त्रिपाठी, बाबू सिंह कुशवाहा, फागू चौहान, दद्दू प्रसाद, राम प्रसाद चौधरी, धर्म सिंह सैनी, राम अचल राजभर, सुखदेव राजभर और इंद्रजीत सरोज को बड़े पोर्टफोलियो दिए थे.

इनमें से सिर्फ नकुल दुबे, सुधीर गोयल और सुखदेव राजभर ही आज पार्टी के साथ खड़े हैं. सुखदेव राजभर मौजूदा विधानसभा में बसपा के विधायक हैं. हालांकि सक्रियता सिर्फ नकुल दुबे की ही बनी हुई है क्योंकि बाकी के दोनों नेता काफी बुजुर्ग हो चले हैं. ऊपर जिन नेताओं का ज़िक्र है उनमें से अधिकतर पार्टी छोड़ चुके हैं और किसी अन्य पार्टी में जा चुके हैं. रामवीर उपाध्याय, राम अचल राजभर और लाल जी वर्मा जैसे नेता बसपा से निष्कासित तो हुए लेकिन अभी कोई और पार्टी ज्वाइन नहीं कर पाए हैं.

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