अय्याशी का अड्डा नहीं थे मुग़ल हरम, यहाँ होते थे ये अहम् काम…

मुग़ल बादशाहों की फ़तेह संघर्षों जीवन के बहुत से तथ्यों से आम जन रूबरू है और हर बादशाह के बारे में यह मशहूर है कि उनके हरम में कितनी औरतें रहा करती थी पर महल के हरम कैसे मुग़ल सुल्तनत के राजनीति में करवटें लाता था इससे अधिकतर बेखबर ही होंगे. दिल्ली के तख़्त हरम के पायलों की आवाज़ पर थिरक जाया करते थे. आगरा का ताज महल, दिल्ली का मीना बाज़ार आज भी निशानी है हरम के रुतबे की.

खानजादा बेगू, (हुमांयू की बड़ी बहन)को अपनी पहली शादी शैबानी खान से करनी पड़ी ताकि पूरा परिवार सही सलामत रह सके और राजगद्दी हुमायूँ से बेदखल न हो. दिल्ली की गद्दी पर क़ाबिज़ होने के बाद भी तलाक़शुदा खानजादा बेगू ने सल्तनत के हर बड़े छोटे फैसलों पर अपनी राय रखी और मनवाई भी.. महामंगा, जोधा बाई, नूर जहाँ, आदि कैसे इतने ही नाम है जिन्होंने मुग़लिया सल्तनत की तकदीर तय की पर इतिहास ने इनकी तकदीरों को समय के धूल से ढक दिया.

यह आम धारणा है कि हरम अय्याशी की जगह होती थी.अगर बाबर-नामा पढ़ा जाये तो इसमें हरम की बहुत ही मज़बूत तस्वीर उभरती है. हरम हर सहूलियतों से परिपूर्ण था हर रोज नए कपडे, गहने आदि आया करते थे. बादशाह की हर पत्नी का हरम में उनके रुतबे का एक कर्म होता था जिसके अनुसार उनको मासिक खर्च मिलता, नौकर, कमरे आदि तय होते.हरम में आपसी खीचा तानी बहुत होती थी. हरम की रक्षा के लिए त्रि-स्तरीय प्रतिबन्ध होता. हरम में जंग में जीती हुई या खूबसूरत औरतें ही नहीं हुआ करती थी बल्कि इनकी संख्या इसलिए भी ज्यादा होती क्योंकि शादी में बहुत से महिला गुलामों सहायकों को साथ भेजा जाता था, सेवा के लिए. हरम की देख-रेख कर रहे मुख्य अधिकारी को नज़िर-ए-महल कहा जाता था, हरम के सारे अधिकारी या तो औरतें होती या तो किन्नर, जिन्हें ख्वाजा-सिरा कहा जाता.

कुल मिलाकर अगर हम ठीक से पढ़ें तो हमें हरम के बारे में कई ऐसी बातों का पता चलता है जिससे आम जनमानस अनजान है.

(वैभव मिश्रा)

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